हिन्दू धर्म के अनुसार काल या आश्रम गर्भाश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम बताये गये हैं
ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारी): यह आश्रम जीवन के पहले चरण का है, जिसमें छात्र या ब्रह्मचारी गुरुकुल में गुरु के निर्देशन में अध्ययन करता है और विद्या प्राप्त करता है। इस आश्रम का मुख्य उद्देश्य ब्रह्मचर्य और विद्या अर्जन है।
गृहस्थ (गृहस्थी): यह आश्रम संसार में परिवार का जीवन जीने वालों के लिए है। इस आश्रम में विवाह के बाद पुत्रवधू सहित पुत्रों की उत्पत्ति और पालन-पोषण, समाजिक कर्तव्यों का निर्वहन आदि शामिल होते हैं।
वानप्रस्थ (वानप्रस्थी): यह आश्रम जीवन के तीसरे चरण का है, जब व्यक्ति संसार से विरक्त होकर अपने परिवार और सामाजिक कर्तव्यों को छोड़कर आध्यात्मिक आत्मसात की ओर अधिगम करता है।
संन्यास (संन्यासी): यह आश्रम जीवन के चौथे चरण का है, जिसमें व्यक्ति संसार से पूरी तरह से विरक्त होकर संयम और साधना के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति के लिए पूरी तरह समर्पित होता है।
केकैय ने वर्तमान झेलम, शाहपुर और गुजरात (पाकिस्तान) के क्षेत्रों में निवास किया था। केकय पंजाब में गंधार का पूर्ववर्ती प्रदेश अर्थात् आजकल के रावलपिंडी पेशावर के आसपास के प्रदेश का प्राचीन नाम। ईक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ की रानी कैकेयी यहीं की राजकन्या थीं। भरत की माँ थी ...
दशरथ के अश्वमेघ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ को शृंगि ऋषि ने पूर्ण कराया
हिंदू धर्म में यज्ञ की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। धर्म ग्रंथों में मनोकामना पूर्ति व किसी बुरी घटना को टालने के लिए यज्ञ करने के कई प्रसंग मिलते हैं। रामायण व महाभारत में ऐसे अनेक राजाओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने अनेक महान यज्ञ किए थे। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भी यज्ञ किए जाने की परंपरा है।
दशरथ ने पुत्र कामना हेतु अश्वमेघ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था इस यज्ञ के माध्यम से वह अपने यजमानी की इच्छा के अनुसार पुत्र प्राप्ति के आशीर्वाद का आश्रय लेने का प्रयास किया था। रामायण में, इस यज्ञ का वर्णन किया गया है, जो बाद में रामायण के कई घटनाओं को प्रेरित करता है। परिणामस्वरूप श्रीराम सहित चार पुत्र जन्मे। राजा दशरथ का यह यज्ञ ऋषि ऋष्यशृंग ने संपन्न करवाया था।
राजा दशरथ की पत्नियों के कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी नाम थे
कौशल्या - वे रामचंद्र भगवान की माता थीं।
कैकेयी - वे भरत के माता थीं।
सुमित्रा - वे लक्ष्मण और शत्रुघ्न की माता थीं।
इन तीनों माताओं के बाद, राजा दशरथ की और भी कई पत्नियाँ थीं जो उनके राजा की परिषद का हिस्सा थीं, परंतु ये तीन माताएं उनकी प्रमुख पत्नियाँ थीं।