बलराम के दुर्योधन और भीमसेन ही शिष्य थे। बलराम ही एकमात्र ऐसे चरित्र हैं जो हमेशा अपना निष्पक्ष रूप दिखाते हैं। दुर्योधन और भीम दोनों ही को गदा की शिक्षा बलराम जी ने दी थी। शिष्य होने के नाते वे दोनों को बराबर और अपना मानते थे, और उनके लिए पांडव और कौरव दोनों ही उनके अपने थे। महाभारत युद्ध निश्चित देख कर वे दुःखी हो कर वहां की भूमि छोड़ कर चले गए थे।
बलराम जी के शिष्यों के नाम कुछ पुराणों और ग्रंथों में उल्लिखित हैं। उनके प्रमुख शिष्यों में से कुछ निम्नलिखित हैं:
दौर्बल्य: यह उनका प्रमुख शिष्य था और बलराम के साथ मिलकर अनेक यात्राओं में गए थे।
सूत: यह भी बलराम के शिष्यों में से एक था।
ताल: यह भी एक प्रमुख शिष्य था जो उनके साथ संगठन और सेवा करता था।
चार्वक: यह भी उनके शिष्यों में एक था।
ये कुछ उनके प्रमुख शिष्यों के नाम हैं, लेकिन इसके अलावा भी अन्य शिष्य हो सकते हैं जो अलग-अलग पुराणों में उल्लेखित होंगे।
बलराम जी मल्लयुद्ध, कुश्ती व गदायुद्ध में पारंगत थे। वह हमेशा हाथ में हल धारण करते थे, इसलिए उन्हें हलधर भी कहते हैं। भगवान बलराम जी की के जन्म की एक और कथा प्रचलित है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार प्रभु श्री राम जी के छोटे भाई लक्ष्मण ने उनसे कहा, मैं आपसे छोटा हूं इसलिए आपकी सारी आज्ञा मानता हूं। इस पर श्रीराम ने उन्हें वरदान दिया कि अगले जन्म में वह उनके बड़े भाई बनेंगे। इसीलिए द्वापर युग में जब भगवान विष्णु जी ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया तो बलराम का जन्म उनके बड़े भाई के रूप में हुआ।
बलराम की पत्नी रेवती 21 हाथ लम्बी थीं जिनको बलराम जी ने अपने हल से खींचकर इन्हें छोटी किया था।
इनका विवाह रेवत की कन्या रेवती के साथ हुआ था। रेवती महाराज रेवतक की पुत्री थीं। इनका जन्म दिव्य अग्नि से हुआ था। रेवती बेहद सुंदर थीं। साथ ही शील गुणों से भी ये परिपूर्ण थीं। जब रेवती बड़ी हुई और विवाह के योग्य हुई तो उसने निश्चय किया कि विवाह करेगी तो उस व्यक्ति से जो दुनिया में सबसे ज्यादा बलशाली होगा। इन्हें बलभद्र, दाऊ सहित अन्य नामों से भी जानते हैं। हाथों में हल व शरीर पर नीला वस्त्र धारण किए भगवान बलराम का रूप देखने को मिलता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को इनका जन्म हुआ। इनकी जयंती हलछठ के नाम से भी प्रचलित है।
बलराम के अन्य नाम
संकर्षणसंकर्षण - जब बलराम गर्भ में थे, जब गर्भ का संकर्षण किया गया था, इसीलिए इनका नाम 'संकर्षण' हुआ था।
अनन्त - वेदों में यह कहा गया है कि इनका कभी अंत नहीं होता, इसीलिए ये 'अनन्त' कहे गये हैं।
बलदेव - इनमें बल की अधिकता है। इसीलिए इनको 'बलदेव' कहते हैं।
हली - बलराम हल धारण को धारण करते हैं, इसीलिए इनका एक नाम 'हली' हुआ है।
शितिवासा - नील रंग का वस्त्र धारण करने से इन्हें 'शितिवासा' (नीलाम्बर) कहा गया है।
मुसली - बलराम मूसल को आयुध बनाकर रखते हैं, इसीलिए 'मुसली' कहे गये हैं।
रेवतीरमण - रेवती के साथ इनका विवाह हुआ था, इसीलिए ये साक्षात 'रेवतीरमण' हैं।
रौहिणेय - रोहिणी के गर्भ में वास करने से इन महाबुद्धिमान संकर्षण को 'रौहिणेय' कहा गया है।
बलभद्र- बलबानों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही इन्हें 'बलभद्र' कहा जाता है।