शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा, व्रत विधि और उद्यापन आरती
कथा
एक बुढ़िया थी जिसके सात बेटे थे। उनमे से छह कमाते थे और एक न कमाने वाला था। वह बुढ़िया उन छ: को अच्छी रसोई बनाकर बड़े प्रेम से खिलाती पर सातवें को बचा-खुचा झूठन खिलाती थी। परन्तु वह भोला था अतः मन में कुछ भी विचार नहीं करता था। एक दिन वह अपनी पत्नी से बोला–देखो मेरी माता को मुझसे कितना प्रेम है? उसने कहा वह तुम्हें सभी की झूठन खिलाती है, फिर भी तुम ऐसा कहते हो चाहे तो तुम समय आने पर देख सकते हो।
एक दिन बहुत बड़ा त्योहार आया। बुढिया ने सात प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बनाए। सातवाँ लड़का यह बात जांचने के लिए सिर दुखने का बहाना करके पतला कपड़ा ओढ़कर सो गया और देखने लगा माँ ने उनको बहुत अच्छे आसनों पर बिठाया और सात प्रकार के भोजन और लड्डू परोसे। वह उन्हें बड़े प्रेम से खिला रही है। जब वे छ: उठ गए तो माँ ने उनकी थालियों से झूठन इकट्ठी की और उनसे एक लड्डू बनाया। फिर वह सातवें लड़के से बोली अरे रोटी खाले, वह बोला माँ मैं भोजन नहीं करूँगा मैं तो परदेश जा रहा हूँ।’ माँ ने कहा –‘कल जाता है तो आज ही चला जा। वह घर से निकल गया। चलते समय उसे अपनी पत्नी की याद आयी जो गोशाला में कंडे थाप रही थी।
सातवें बेटे का परदेश जाना-
वह बोला: हम विदेश को जा रहे है,
आएंगे कछु काल।
तुम रहियो संतोष से, धरम अपनों पाल।
इस पर उसकी पत्नी बोली:-
जाओ पिया आनन्द से, हमारी सोच हटाए।
राम भरोसे हम रहे, ईश्वर तुम्हें सहाय।
देहु निशानी आपणी, देख धरूँ मैं धीर।
सुधि हमारी ना बिसारियो, रखियो मन
इस पर वह लड़का बोला: मेरे पास कुछ नहीं है। यह अंगूठी है सो ले और मुझे भी अपनी कोई निशानी दे दे।
वह बोली मेरे पास क्या है? यह गोबर भरे हाथ है। यह कहकर उसने उसकी पीठ पर गोबर भरे हाथ की थाप मार दी। वह लड़का चल दिया। ऐसा कहते है, इसी कारण से विवाह में पत्नी पति की पीठ पर हाथ का छापा मारती है।
परदेश मे नौकरी-
चलते समय वह दूर देश में पहुँचा। वह एक व्यापारी की दुकान पर जाकर बोला ‘भाई मुझे नौकरी पर रख लो।’ व्यापारी को नौकर की जरुरत थी। अतः बोला तन्ख्वाह काम देखकर देंगे। तुम रह जाओ। वह सवेरे 7 बजे से रात की 12 बजे तक नौकरी करने लगा। थोड़े ही दिनों में सारा लेन देन और हिसाब किताब करने लगा। सेठ के 7-8 नौकर चक्कर खाने लगे। सेठ ने उसे दो तीन महीने में आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना दिया। बारह वर्ष में वह नामी सेठ बन गया और उसका मालिक उसके भरोसे काम छोड़कर कहीं बाहर चला गया।
पति की अनुपस्थिति में सास का अत्याचार-
उधर उसकी औरत को सास और जिठानियाँ बड़ा कष्ट देने लगी। वे उसे लकडी लेने जंगल में भेजती। भूसे की रोटी देती, फूटे नारियल में पानी देती। वह बड़े कष्ट से जीवन बिताती थी। एक दिन जब वह लकड़ी लेने जा रही थी तो रास्ते में उसने कई औरतों को व्रत करते देखा।
संतोषी माता का व्रत-
वह पूछने लगी: बहनों यह किसका व्रत है, कैसे करते है और इससे क्या फल मिलता है?
तो एक स्त्री बोली: यह संतोषी माता का व्रत है इसके करने से मनोवांछित फल मिलता है, इससे ग़रीबी, मन की चिंताएँ, राज के मुकद्दमे। कलह, रोग नष्ट होते है और संतान, सुख, धन, प्रसन्नता, शांति, मन पसंद वर मिले व बाहर गये हुए पति के दर्शन होते है।’ उसने उसे व्रत करने की विधि बता दी।
उसने रास्ते में सारी लकडियाँ बेच दी व गुड और चना ले लिया। उसने व्रत करने की तैयारी की। उसने सामने एक मंदिर देखा तो पूछने लगी यह मंदिर किसका है?
वह कहने लगे: यह संतोषी माता का मंदिर है। वह मंदिर में गई और माता के चरणों में लोटने लगी। वह दुखी होकर विनती करने लगी ‘माँ ! मैं अज्ञानी हूँ! मैं बहुत दुखी हूँ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ! मेरा दुःख दूर करो!’माता को दया आ गयी। एक शुक्रवार को उसके पति का पत्र आया और अगले शुक्रवार को पति का भेजा हुआ धन मिला। अब तो जेठ जेठानी और सास नाक सिकोड़ के कहने लगे। अब तो इसकी खातिर बढेगी, यह बुलाने पर भी नहीं बोलेगी।
वह बोली: पत्र और धन आवे तो सभी को अच्छा हैं।’ उसकी आँखों में आंसू आ गये। वह मंदिर में गई और माता के चरणों में गिरकर बोली हे माँ! मैंने तुमसे पैसा कब माँगा था? मुझे तो अपना सुहाग चाहिये। मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा करना माँगती हूँ। तब माता ने प्रसन्न होकर कहा– ‘जा बेटी तेरा पति आवेगा।’ वह बड़ी प्रसन्नता से घर गई और घर का काम काज करने लगी। उधर संतोषी माता ने उसके पति को स्वप्न में घर जाने और पत्नी की याद दिलाई। उसने कहा माँ मैं कैसे जाऊँ, परदेश की बात है, लेन-देन का कोई हिसाब नहीं है।’ माँ ने कहा मेरी बात मान सवेरे नहा धोकर मेरा नाम लेकर घी का दीपक जलाकर दंडवत करके दुकान पर बैठना। देखते देखते सारा लेन देन साफ़ हो जायेगा। धन का ढेर लग जायेगा।
सवेरे उसने अपने स्वप्न की बात सभी से कही तो सब हँसी उड़ाने लगे। वे कहने लगे कि कहीं सपने भी सत्य होते है। पर एक बूढे ने कहा भाई ! जैसे माता ने कहा है वैसे करने में का डर है?’उसने नहा धोकर, माता को दंडवत करके घी का दीपक जलाया और दुकान पर जाकर बैठ जाया। थोडी ही देर में सारा लेन देन साफ़ हो गया, सारा माल बिक गया और धन का ढेर लग गया। वह प्रसन्न हुआ और घर के लिए गहने और सामान वगेरह ख़रीदने लगा। वह जल्दी ही घर को रवाना हो गया।
उधर बेचारी उसकी पत्नी रोज़ लकडियाँ लेने जाती और रोज़ संतोषी माता की सेवा करती। उसने माता से पूछा, हे माँ ! यह धूल कैसी उड़ रही है? माता ने कहा तेरा पति आ रहा है। तूं लकडियों के तीन बोझ बना लें। एक नदी के किनारे रख, एक यहाँ रख और तीसरा अपने सिर पर रख ले। तेरे पति के दिल में उस लकडी के गट्ठे को देखकर मोह पैदा होगा। जब वह यहाँ रुक कर नाश्ता पानी करके घर जायेगा, तब तूँ लकडियाँ उठाकर घर जाना और चोक के बीच में गट्ठर डालकर ज़ोर जोर से तीन आवाजें लगाना, सासूजी ! लकडियों का गट्ठा लो, भूसे की रोटी दो और नारियल के खोपडे में पानी दो। आज मेहमान कौन आया है?” इसने माँ के चरण छूए और उसके कहे अनुसार सारा कार्य किया।
वह तीसरा गट्ठर लेकर घर गई और चोक में डालकर कहने लगी "सासूजी! लकडियों का गट्ठर लो, भूसे की रोटी दो, नारियल के खोपडे में पानी दो, आज मेहमान कौन आया है?" यह सुनकर सास बाहर आकर कपट भरे वचनों से उसके दिए हुए कष्टों को भुलाने के लिए कहने लगी‘ बेटी! तेरा पति आया है। आ, मीठा भात और भोजन कर और गहने कपड़े पहन।’ अपनी माँ के ऐसे वचन सुनकर उसका पति बाहर आया और अपनी पत्नी के हाथ में अंगूठी देख कर व्याकुल हो उठा। उसने पूछा,यह कौन है?’माँ ने कहा यह तेरी बहू है आज बारह बरस हो गए, यह दिन भर घूमती फिरती है, काम काज करती नहीं है, तुझे देखकर नखरे करती है। वह बोला ठीक है। मैंने तुझे और इसे देख लिया है, अब मुझे दुसरे घर की चाबी दे दो, मैं उसमे रहूँगा।
शुक्रवार व्रत के उद्यापन में हुई भूल, किया खटाई का इस्तेमाल-
माँ ने कहा ठीक है, जैसी तेरी मरजी। और उसने चाबियों का गुच्छा पटक दिया। उसने अपना सामान तीसरी मंज़िल के ऊपर के कमरे में रख दिया। एक ही दिन में वे राजा के समान ठाठ – बाठ वाले बन गये। इतने में अगला शुक्रवार आया। बहू ने अपनी पति से कहा –मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है। वह बोला बहुत अच्छा ख़ुशी से कर ले। जल्दी ही उद्यापन की तैयारी करने लगी। उसने जेठ के लड़कों को जीमने के लिए कहा। उन्होंने मान लिया। पीछे से जिठानियों ने अपने बच्चों को सिखादिया तुम खटाई मांगना जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो। लड़कों ने जीम कर खटाई मांगी। बहू कहने लगी ‘भाई खटाई किसी को नहीं दी जायेगी। यह तो संतोषी माता का प्रसाद है।’ लडके खड़े हो गये और बोले पैसा लाओ| वह भोली कुछ न समझ सकी उनका क्या भेद है| उसने पैसे दे दिये और वे इमली की खटाई मंगाकर खाने लगे। इस पर संतोषी माता ने उस पर रोष किया।
माँ संतोषी से माँगी माफी-
राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गये। वह बेचारी बड़ी दुखी हुई और रोती हुई माताजी के मंदिर में गई और उनके चरणों में गिरकर कहने लगी‘ हे! माता यह क्या किया? हँसाकर अब तूँ मुझे क्यों रुलाने लगी? माता बोली पुत्री मुझे दुःख है कि तुमने अभिमान करके मेरा व्रत तोड़ा है और इतनी जल्दी सब बातें भुला दी। वह कहने लगी माता ! मेरा कोई अपराध नहीं है। मुझे तो लड़को ने भूल में दल दिया। मैंने भूल से ही उन्हें पैसे दे दिये। माँ मुझे क्षमा करो मैं दुबारा तुम्हारा उद्यापन करुँगी।
फिर किया व्रत का उद्यापन-
माता बोल: जा तेरा पति रास्ते में आता हुआ ही मिलेगा। उसे रास्ते में उसका पति मिला।
सके पूछने पर वह बोला: राजा ने मुझे बुलाया था मैं उससे मिलने गया था। वे फिर घर चले गये।
कुछ ही दिन बाद फिर शुक्रवार आया। वह दुबारा पति की आज्ञा से उद्यापन करने लगी उसने फिर जेठ के लड़को को बुलावा दिया। जेठानियों ने फिर वहीं बात सिखा दी। लड़के भोजन की बात पर फिर खटाई माँगने लगे।उसने कहा: खटाई कुछ भी नहीं मिलेगी आना हो तो आओ। यह कहकर वह ब्राह्मणों के लड़को को लाकर भोजन कराने लगी। यथाशक्ति उसने उन्हें दक्षिणा दी। संतोषी माता उस पर बड़ी प्रसन्न हुई,
संतोषी माता का फल-
माता की कृपा से नवमें मास में उसके एक चंद्रमा के समान सुन्दर पुत्र हुआ। अपने पुत्र को लेकर वह रोजाना मंदिर जाने लगी।
एक दिन संतोषी माता ने सोचा कि यह रोज़ यहाँ आती है। आज मैं इसके घर चलूँ। इसका सासरा देखूं। यह सोचकर उसने एक भयानक रूप बनाया। गुड व चने से सना मुख, ऊपर को सूँड के समान होठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी। इसी सूरत में वह उसके घर गई। देहली में पाँव रखते ही उसकी सास बोली देखो कोई डाकिन आ रही है, इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जायेगी। लड़के भागकर खिड़की बन्द करने लगे। सातवे लड़के की बहु खिड़की से देख रही थी। वह वही से चिल्लाने लगी 'आज मेरी माता मेरे ही घर आई है।' यह कहकर उसने बच्चे को दूध पीने से हटाया।
इतने में सास बोली: पगली किसे देख कर उतावली हुई है, बच्चे को पटक दिया है।
इतने में संतोषी माता के प्रताप से वहाँ लड़के ही लड़के नज़र आने लगे
बहू बोली: सासूजी मैं जिसका व्रत करती हूँ, यह वो ही संतोषी माता हैं। यह कह कर उसने सारी खिड़कियां खोल दी। सबने संतोषी माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे हे माता ! हम मूर्ख हैं, अज्ञानी है, पापिनी है, तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानती, तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बहुत बड़ा अपराध किया है। हे जगत माता ! आप हमारा अपराध क्षमा करो। इस पर माता उन पर प्रसन्न हुई। बहू को जैसा फल दिया वैसा माता सबको दें।, जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो।
बोलो जय संतोषी माता की
संतोषी माता व्रत विधि-
- सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफ़ाई इत्यादि पूर्ण कर लें।
- स्नानादि के पश्चात् घर में किसी सुन्दर व पवित्र जगह पर माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- माता संतोषी के संमुख एक कलश जल भर कर रखें। कलश के ऊपर एक कटोरा भर कर गुड़ व चना रखें।
- माता के समक्ष एक घी का दीपक जलाएं।
- माता को अक्षत, फूल, सुगन्धित गंध, नारियल, लाल वस्त्र या चुनरी अर्पित करें।
- माता संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ।
- संतोषी माता की जय बोलकर माता की कथा आरम्भ करें।
- इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ और भुने चने रखें।
- कथा की समाप्ती के पश्चात्त श्रद्धापूर्वक सपरिवार आरती करें।
- कथा व आरती के पश्चात्त हाथ का गुड़ व चना गौमाता को खिलाएं, तथा कलश पर रखा हुआ गुड़ चना सभी को प्रसाद के रुप में बांट दें।
- कलश के जल का पूरे घर में छिड़काव करें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में ड़ाल दें।
- इस प्रकार विधि पूर्वक श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न होकर 16 शुक्रवार तक नियमित उपवास रखें। शीघ्र विवाह की कामना, व्यवसाय व शिक्षा के क्षेत्र में कामयाबी और मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति के लिए महिला व पुरुष दोनों की एक समान यह व्रत धारण कर सकतें हैं।
इस व्रत में बरतें विशेष सावधानीः-
- इस दिन न तो खट्टी वस्तु खाएं और न ही स्पर्श करें।
- इस दिन केवल व्रतधारी के लिए ही नहीं अपितु परिवार के हरेक सदस्य के लिए खट्टी वस्तु वर्जित मानी गयी गई है। इसलिए घर में खट्टी वस्तु बननी ही नहीं चाहिए।
- खट्टी वस्तु का यहाँ तक प्रयोग वर्जित माना गया है कि पूजा व घर में खट्टे फ़लों को भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
- परिवार में ही नहीं अपितु किसी बाहरी व्यक्ति को भी इस दिन खट्टी वस्तु नहीं देना चाहिए।
उद्यापन
16 शुक्रवार का व्रत करने के बाद, अंतिम शुक्रवार को व्रत का उद्यापन करना चाहिए। इसके लिए उपरोक्त विधि से माता संतोषी की पूजा कर 8 लड़कों को भोजन के लिए आमंत्रित करें। अढ़ाई सेर आटे का खाजा, अढ़ाई सेर चावल की खीर तथा अढ़ाई सेर चने के साग का भोजन पकाना चाहिए। यह भोजन बालकों को बहुत ही श्रद्धा व प्यार से कराएं, तथा केले का प्रसाद दें। भोजन के पश्चात् उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें। दक्षिणा में उन्हें पैसे न देकर कोई वस्तु दक्षिणा में दे कर विदा करें। इस प्रकार विधि-विधान से पूजन करने से माता प्रसन्न होकर अपने भक्तों के दुःख दारिद्रय को दूर कर, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
सन्तोषी माता की आरती
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता । अपने सेवक जन की, सुख सम्पति दाता ।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ।
- सुन्दर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो । हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो ।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ।
- गेरू लाल छटा छबि, बदन कमल सोहे । मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे ।
- गेरू लाल छटा छबि, बदन कमल सोहे । मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे ।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर दुरे प्यारे । धूप, दीप, मधु, मेवा, भोज धरे न्यारे।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो । संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो ।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही । भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही ।
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता।
- मंदिर जग मग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई । विनय करें हम सेवक, चरनन सिर नाई
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता।
- भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै । जो मन बसे हमारे, इच्छित फल दीजै
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ।
- दुखी दारिद्री रोगी, संकट मुक्त किए । बहु धन धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- ध्यान धरे जो तेरा, वांछित फल पायो । पूजा कथा श्रवण कर, घर आनन्द आयो
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- चरण गहे की लज्जा, रखियो जगदम्बे । संकट तू ही निवारे, दयामयी अम्बे ॥
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
- सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे । रिद्धि सिद्धि सुख सम्पति, जी भर के पावे ॥
- जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता । अपने सेवक जन की, सुख सम्पति दाता ।
बोलो जय संतोषी माता की
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यक्ष प्रश्न महाभारत की प्रसिद्ध घटना है। यह अरण्य पर्व में पाया जाता है। यक्ष के प्रश्न का उत्तर देने में विफल रहने पर, नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम मारे जाते हैं, लेकिन जब युधिष्ठिर प्रश्नों का सही...
पशुपति व्रत, विधि, नियम, कथा, पूजन सामग्री, मंत्र, उद्यापन और फायदे
पशुपति व्रत कैसे करते हैं ,विधि? यदि आप पशुपति व्रत का पालन करने का इरादा रखते हैं, तो ऐसा करने का उचित तरीका जानना महत्वपूर्ण है। आपकी सहायता के लिए यहां कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं। पशुपति का...
बिल्व या बेल पत्र का महत्व
बिल्व पत्र का भगवान शंकर को प्रिय है। बिल्व पत्र का महत्व बिल्व तथा श्रीफल नाम से प्रसिद्ध यह फल बहुत ही काम का है। यह जिस पेड़ पर लगता है वह शिवद्रुम भी कहलाता है। बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक,...
धनतेरस का पर्व
धनतेरस से दीपावली के त्योहार का आरंभ माना जाता है। दिवाली या दीपावली रोशनी का त्योहार है। यह हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। हर किसी को इस महापर्व का साल भर इंतजार रहता है। दीपोत्सव...
निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी बुधवार, 31 मई 2023 एकादशी तिथि प्रारंभ : 30 मई 2023 को दोपहर 01:07 बजे एकादशी तिथि समाप्त : 31 मई 2023 को दोपहर 01 बजकर 45 मिनट पर एकादशी का व्रत हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ज्येष्ठ मास...
भगवान गणेश की आरती और चालीसा
श्री गणेश जी की चालीसा दोहा जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ चौपाई जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक...
मां कालरात्रि के पूजन मुहूर्त, मंत्र, पूजा विधि और आरती
शारदीय नवरात्रि का 21 अक्टूबर 2023, शनिवार को सातवां दिन है। यह दिन मां कालरात्रि को समर्पित है। मां कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह काला है। मां की श्वास से आग निकलती है। मां के बाल बड़े और बिखरे हुए...
मौन श्रद्धा: मौनी अमावस्या परंपराएँ
मौनी अमावस्या अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए मनाई जाती है और विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं से जुड़ी है। मौनी अमावस्या का उत्सव हिंदू परंपराओं में निहित है, और यह दिन कई कारणों से मनाया जाता...
माघ पूर्णिमा : आत्मा की प्रकाश की पूर्णिमा या धार्मिक समर्पण की पूर्णिमा
माघ पूर्णिमा व्रत एक हिन्दू धार्मिक व्रत है जो माघ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत हिन्दू परम्परा में महत्वपूर्ण माना जाता है और इसे संगीत, ध्यान, धर्मिक कार्यों, और दान-धर्म के रूप...
काल भैरव जयंती 2023
मार्गशीर्ष माह 28 नवंबर 2023 से शुरू हो रहा है. शिव भक्तों के लिए काल भैरव जयंती बहुत खास होती है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप कालभैरव की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि काल भैरव की पूजा करने...
दिवाली 2023
दिवाली, रोशनी का हिंदू त्योहार, भारत का सबसे प्रतीक्षित और सभी त्योहारों में सबसे उज्ज्वल है। दिवाली मूल शब्द "दीपावली" का संक्षिप्त रूप है, जो "दीपा" शब्द से बना है, जो दीपक या लालटेन को दर्शाता है,...
सावन का महीना शिवजी की अराधना के लिए समर्पित
से शुरू हो रहा है सावन 2023 इस बार सावन का महीना करीब 2 महीने का होने वाला है। इस बार सावन महीने की शुरुआत 4 जुलाई 2023 से हो रही है और 31 अगस्त 2023 को इसका समापन होगा। यानी इस बार भक्तों को भगवान शिव की उपासना...
श्री गणेश जी की आरती, पूजा और स्तुति मंत्र
श्री गणेश जी की आरती जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥ एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥ जय गणेश,...
मकर संक्रांति दीप्तिमान आनंदोत्सव 2024
संक्रांति का अर्थ प्रत्येक महीने के अंतिम दिन को संक्रांति के रूप में जाना जाता है जो एक महीने के बढ़ने या ख़त्म होने और दूसरे की शुरुआत का प्रतीक है। यह सूर्य-देवता की पूजा है जो पृथ्वी पर जीवन...
श्री मन नारायण नारायण नारायण। भजन
श्री मन नारायण नारायण नारायण। भजन भजमन नारायण नारायण नारायण।। श्री मन नारायण नारायण नारायण ,ॐ नारायण नारायण नारायण। लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण,ॐ नारायण नारायण नारायण।। गज और...
भाई दूज 2023
भाई दूज दिवाली के बाद दूसरे दिन मनाया जाता है। भाई दूज का अर्थ नाम में ही दर्शाया गया है, क्योंकि यह एक भाई और एक बहन के बीच प्यार के रिश्ते को दर्शाता है। इस दिन एक बहन अपने भाई की सफलता और समृद्धि...
रविवार व्रत कथा, पूजा विधि, आरती, मंत्र और महत्व,
रविवार व्रत कथा प्राचीन काल की बात किसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह हर रविवार को नियमित रूप से व्रत करती थी। इसके लिए रविवार के दिन वह सूर्योदय से पहले जागती और स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन की...
सत्यनारायण व्रत कथा
सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, 88,000 ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती...
रवि प्रदोष व्रत
दिसंबर माह में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रदोष व्रत रखा जाता है दोनों प्रदोष व्रत रविवार को होने के कारण रवि प्रदोष व्रत होंगे दिसंबर को पहला प्रदोष व्रत 10 दिसंबर, रविवार और दूसरा...
मार्गशीर्ष अमावस्या 2023
मार्गशीर्ष अमावस्या 2023: तिथियां और समय इस वर्ष की अमावस्या तिथि 12 दिसंबर, 2023 को 06:26:15 बजे शुरू होती है। और 13 दिसंबर, 2023 को 05:03:23 बजे समाप्त होती है। इस दौरान, ज्योतिषियों का मानना है कि ब्रह्मांड की ऊर्जा...
मां महागौरी की चालीसा
मां महागौरी की चालीसा मन मंदिर मेरे आन बसो, आरम्भ करूं गुणगान, गौरी माँ मातेश्वरी, दो चरणों का ध्यान। पूजन विधी न जानती, पर श्रद्धा है आपर, प्रणाम मेरा स्विकारिये, हे माँ प्राण आधार। नमो नमो हे...
मौनी अमावस्या की पौराणिक व्रत कथा एवं पूजा विधि:
मौनी अमावस्या के साथ कोई विशिष्ट "मौनी व्रत" नहीं जुड़ा है, लेकिन व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक प्रथाओं के हिस्से के रूप में इस दिन उपवास करना या कुछ पूजा विधियों में शामिल होना चुन सकते हैं। यदि आप मौनी...
भगवान शिव की कृपा: मासिक शिवरात्रि के पर्व का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
मासिक शिवरात्रि, हिन्दू धर्म में हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली एक विशेष शिवरात्रि है। इसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इसे हर माह मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव की...
