गौरी तपो व्रत
गौरी तपो व्रत
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने सबसे पहले भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए यह व्रत रखा था। वर्षों की 'तपो' के बाद अंततः उसे उसकी इच्छाएँ पूरी हुईं। तब से, उनके बाद से एक लोकप्रिय धारणा है कि जो भी युवा लड़की इस गौरी व्रत को भक्तिपूर्वक रखेगी और देवी पार्वती की पूजा करेगी, उसे उसका पसंदीदा पति मिलेगा।
गौरी तपो व्रत 2023 12 दिसंबर मंगलवार को है गौरी तपो व्रत, हिंदू धर्म में एक शुभ अनुष्ठान है यह अनुष्ठान पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के 'आषाढ़' महीने में मनाया जाता है। गौरी तपो व्रत एक पांच दिवसीय उपवास अनुष्ठान है जो 'एकादशी' (11वें दिन) से शुरू होता है और हिंदू धर्म के 'शुक्ल पक्ष' (चंद्रमा के बढ़ते चरण) के दौरान 'पूर्णिमा' (पूर्णिमा के दिन) तक जारी रहता है। गौरी तपो व्रत देवी पार्वती की पूजा के लिए समर्पित है और अविवाहित महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उपवास दिवस है। गौरी व्रत मुख्य रूप से अविवाहित लड़कियों द्वारा किया जाता है।
गौरी तपो व्रत 2023 पर महत्वपूर्ण समय
सूर्योदय 12 दिसंबर, सुबह 7:02 बजे
सूर्यास्त 12 दिसंबर, शाम 5:38 बजे
अमावस्या तिथि का समय 12 दिसंबर, 06:24 पूर्वाह्न - 13 दिसंबर, 05:02 पूर्वाह्न
गौरी तपो व्रत के दौरान अनुष्ठान:
गौरी तपो व्रत के दिन, अविवाहित महिलाएं सूर्योदय के समय उठती हैं और जल्दी स्नान करती हैं।
वे इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करते हैं। देवी को प्रसन्न करने के लिए कुमकुम, अक्षत, धूप, फूल और अगरबत्ती के रूप में विभिन्न चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं।
इस दिन कुंवारी लड़कियां आंशिक व्रत रखती हैं। इन पांच दिनों में घी, आटा और दूध से बना भोजन ही खाया जाता है। व्रत के दौरान तरह-तरह के फल भी खा सकते हैं हालाँकि गौरी तपो व्रत के व्रतकर्ता को पाँचों दिन नमक खाने से सख्ती से बचना चाहिए।
गौरी व्रत व्रत के दौरान छोटे गमले में मक्का उगाने की अनोखी परंपरा है। इन पांच दिनों में देवी पार्वती के साथ सूर्य देव और मकई के इन कोमल अंकुरों की भी पूजा की जाती है।
अंतिम दिन, आषाढ़ पूर्णिमा पर, पूजा अनुष्ठान समाप्त करने के बाद, मकई के अंकुर को 'प्रसाद' के रूप में खाया जाता है। बचे हुए अंकुरों को परिवार के अन्य सदस्यों में बाँट दिया जाता है। पूजा के बाद घड़े को रख दिया जाता है और बचे हुए मक्के के हिस्से को मिट्टी सहित किसी पेड़ के नीचे रख दिया जाता है।
गौरी पूजन की आवश्यक सामग्री
गौरी पूजन मे सुहाग के समान और 16-16 वस्तुओ का बहुत महत्व है
क्रमांक आवश्यक सामग्री
1 चौकी/पाटा,
2 सफेद व लाल कपडा एवं कलश
3 गेहू व चावल
4 आटे का चौ-मुखी दीपक, अगरबत्ती, धुपबत्ती, कपूर, माचिस
5 16-16 तार की चार बत्ती
6 साफ व पवित्र मिट्टी, माता गौरा की प्रतिमा बनाने के लिए
7 अभिषेक के लिये- साफ जल, दूध, पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर का मिश्रण)
8 माता गौरा के लिये वस्त्र
9 पूजा सामग्री-मौली, रोली (कुमकुम), चावल, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहन्दी, काजल, सिंदूर
10 16 तरह के फूल, माला, आटे के लड्डू, फल
11 5 तरह के मेवे, 7 तरह के अनाज
12 16 पान, सुपारी, लोंग
13 1 सुहाग पिटारी
(जिसमे सिंधुर, टीकी, नथ, काजल, मेहन्दी, हल्दी, कंघा, तेल, शीशा, 16 चूड़ीया, बिछिया, पायल, नैलपोलिश, लिपस्टिक, खिलौना, बालों की पिन आदि शामिल होते हैं)
14 इच्छानुसार नैवेद्य/प्रसादी
गौरी पूजा व्रत की कथा
बहुत पुरानी बात थी, एक समय मे कुरु नामक देश मे, श्रुतिकीर्ति बहुत प्रसिद्ध सर्वगुण संपन्न, अतिविद्द्वान राजा हुआ करता था जोकि, अनेको कलाओं मे तथा विशेष रूप से धनुष विध्या मे निपूर्ण था सम्पूर्ण सुखो के बाद भी राजा बहुत दुखी और परेशान था क्योंकि, उसके कोई पुत्र नही था वह संतान सुख से वर्जित था जिसके चलते राजा ने कई जप-तप, ध्यान, और अनुष्ठान कर देवी की भक्ति-भाव से तपस्या करी
देवी प्रसन्न हुई, और कहा- हे राजन! मांगो क्या मांगना चाहते हो तब राजा ने कहा माँ, मे सर्वसुखो व धन-धान्य से समर्ध हूँ यदि कुछ नही है तो, वह संतान-सुख जिससे मैं वंचित हूँ मुझे वंश चलाने के लिये वरदान के रूप मे, एक पुत्र चाहिए देवी माँ ने कहा राजन, यह बहुत ही दुर्लभ वरदान है, पर तुम्हारे तप से प्रसन्न हो कर, मैं यह वरदान तो देती हूँ, परन्तु तुम्हारा पुत्र सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा यह बात सुन कर राजा और उनकी पत्नी बहुत चिंतित हुये सभी बातोँ को जानते हुए भी राजा-रानी ने यह वरदान माँगा
देवी माँ के आशिर्वाद से रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया राजा ने उस बालक का नामकरण संस्कार कर, उसका नाम चिरायु रखा साल बीतते गये, राजा को अपने पुत्र की अकाल म्रत्यु की चिंता सताने लगी
तब किसी विद्वान के कहानुसार, राजन ने सोलह वर्ष से पूर्व ही, अपने पुत्र का विवाह ऐसी कन्या से कराया जो, गौरी के व्रत करती थी, जिससे उस कन्या को भी व्रत के फल स्वरूप, सर्वगुण सम्पन्न वर की प्राप्ति हुई तथा उस कन्या को सौभाग्यशाली व सदा सुहागन का वरदान प्राप्त था जिससे विवाह के उपरान्त, उसके पुत्र की अकाल मत्यु का दोष स्वत: ही समाप्त हो गया, और राजा का वह पुत्र अपने नाम के अनुसार, चिरायु हुआ
इस तरह जो भी, स्त्री या कुवारी कन्या पुरे भक्ति-भाव से, यह फलदायी गौरी व्रत करती है, उसकी सब ईच्छा पूर्ण होकर सर्वसुखो की प्राप्ति होती है
गौरी पूजा मंत्र
सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके
शरणनेताम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते
गौरी पूजा व्रत उद्द्यापन
मन्नत के अनुसार, अपने गौरी के व्रत पूर्ण कर आखरी मंगलवार को किसी पंडित या पुरोहित के सानिध्य मे तथा सोलह सुहागन स्त्रियों को भोजन करा कर इस व्रत की समाप्ति करनी चाहिए जिसमे पूजन विधी हर मंगलवार की तरह करके, आखरी मंगलवार को पुरे परिवार के साथ अर्थात कुवारी कन्या अपने माता-पिता के साथ व सुहागन स्त्री अपने पति के साथ हवन करे पूर्णाहुति मे पुरे परिवार व सगे-संबंधियों को शामिल कर अंत मे आरती करे इस तरह गौरी व्रत का उद्धयापन किया जाता है
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