नागमाता मनसा देवी
मनसा माता भगवान शिव की पुत्री हैं। उन्होंने तपस्या के द्वारा अपना शरीर सुखा दिया जिसकी वजह से उनका नाम जरत्कारु पड़ा। पिता शिव से उन्हें नागलोक का साम्राज्य मिला। मनसा देवी नागों की माता हैं। उन तपस्विनी देवी के सुपुत्र आस्तिक मुनि ने सर्पों को परिक्षित राजा के बेटे जन्मेजय के सर्प यज्ञ से बचाया था। हरिद्वार में मनसा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।बंगाल के अनेक घरो में माँ मनसा कुलदेवी के रूप में पूजित है।
सर्पो ने आस्तिक मुनि को वचन दिया था, कि महाराज जहां आपका नाम लिया जायेगा वहां उपद्रव नही फैलायेंगे, वहॉ अपना जहर नही फैलायेंगे। इसलिए आज भी अगर कहीं सांप आ जाये या सांप का डर होतो।
"मुनी राजम् अस्तिकम् नम:"
जप करें वहां सांप नही आयेगा, आया भी तो ये मंत्र सुनकर चला जायेगा |
अगर किसी भवन में सर्पों का प्रकोप बढ़ गया हो। तो -
दुहाई जरुत्कार की ! दुहाई अस्तिक मुनि की ! दुहाई राजा जन्मेजय !
ऐसा पढ़ते हुए पीली सरसों हाथ में लेकर मंत्र पढ़ते हुए सरसों पर फूंक मारें। इसके बाद सरसों बिखेर दे। ऐसा सात बार करें। इसके बाद तीन बार हाथ पर ताली बजाएं और बिना पीछे देखें वहां से निकल जाएं। वो भवन सर्पों के प्रकोप से मुक्त हो जाएगा ।
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