पुत्रदा एकादशी: पौष मास के कृष्ण पक्ष की विशेष व्रत कथा और आरती

पुत्रदा एकादशी: पौष मास के कृष्ण पक्ष की विशेष व्रत कथा और आरती

पौष पुत्रदा एकादशी, जिसे दुर्मुखी एकादशी भी कहा जाता है, हिन्दू कैलेंडर के मास 'पौष' में आने वाली एकादशी है। इस तिथि को विशेष रूप से विष्णु भगवान की पूजा की जाती है और भक्तों के लिए यह एक महत्वपूर्ण व्रत है। इसे 'पुत्रदा' के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसका पालन करने से पुत्र संतान की प्राप्ति की जाती है, जिससे इसका इतिहास भी जुड़ा है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष रूप से तुलसी के पत्ते, फल, फूल, नीम के पत्ते, गुड़, गंध और जल का उपयोग किया जाता है। भगवान विष्णु के चार मुर्तियां तुलसी, शालिग्राम, सालग्राम, और बनमाली, को पूजा जाता है। इस दिन विशेष रूप से सत्यनारायण व्रत का आयोजन किया जाता है और व्रत कथा का पाठ किया जाता है।

इस साल पौष पुत्रदा एकादशी जनवरी 21, 2024 को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, 20 जनवरी के दिन 07:26 पी एम से एकादशी तिथि की शुरुआत होगी, जो 21 जनवरी के दिन 07:26 पी एम मिनट तक रहेगी। एकादशी व्रत का महत्व है क्योंकि इसे भगवान विष्णु की अर्चना के रूप में माना जाता है और इसे करने से विशेष रूप से पुत्र संतान की कामना की जाती है। भक्त इस दिन विशेष रूप से उपवास करते हैं और भगवान की भक्ति में लगे रहते हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत की विधि का पालन करने के लिए निम्नलिखित कदमों का अनुसरण किया जा सकता है:

1. संकल्प:
इस व्रत की शुरुआत में संकल्प लेना चाहिए। संकल्प में व्रत का उद्दीपन, अपनी शक्ति से व्रत का पालन करने की संकल्पना, और इस व्रत के फल की कामना की जाती है।
2. उपायन:
व्रत की सारांशिक नियमों का पालन करें, जिसमें उपवास, नींदा परित्याग, श्राद्धालुपरित्याग (शव और मृत्युसंबंधी सामग्री त्याग), श्रावण व्रत और सत्संग शामिल हो सकते हैं।
3. पूजा और अर्चना:
भगवान विष्णु की पूजा के लिए तुलसी, शालिग्राम, सालग्राम, और बनमाली की मूर्तियों का पूजन करें। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, रोली, अक्षता, तुलसी के पत्ते, गुड़, फल, और गंध का उपयोग करें।
4. व्रत कथा:
पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें। इसके माध्यम से व्रत का महत्व और इसके फल के बारे में जानकारी प्राप्त करें।
5. दान-पुण्य:
इस दिन दान और पुण्य कार्यों को बढ़ावा दें। यदि संभावना हो, तो गरीबों को भोजन, वस्त्र, धन, और अन्य आवश्यकताओं की प्रदान करें।
6. उपवास का खाना:
जो भक्त उपवास कर रहे हैं, उन्हें व्रत के दिन विशेष रूप से शाकाहारी भोजन करना चाहिए। दाना, कुट्टू का आटा, साबूदाना, फल, और दूध के उत्तम विकल्प हो सकते हैं।
7. व्रत का समापन:
व्रत का समापन विशेष रूप से संध्या काल में भगवान की पूजा और आरती के साथ करें। संकल्प फिर से लें और व्रत का समापन करें।
इन आसान से उपायों का पालन करके भक्त भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को व्यक्त कर सकते हैं और एक पवित्र एकादशी व्रत का अच्छा अनुभव कर सकते हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का सारांश निम्नलिखित है:
कथा का नाम है "पुत्रदा एकादशी व्रत कथा" और यह कथा भगवान श्रीकृष्ण के समय की है।
कथा:
पुराणों में कहा जाता है कि द्वापर युग में महाराज कुंदुदरी, रत्नाकरी नामक राजकुमारी की पति, धर्मपरायण और दानशील राजा थे। कुंदुदरी बहुत दिनों तक संतान सुख की कामना करती रहीं, लेकिन उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी।
एक दिन राजा कुंदुदरी अपनी पत्नी के साथ अपने राजमहल के बाग में घूम रहे थे। वहां उन्होंने सभी पेड़-पौधों को देखा, लेकिन एक विशेष पुष्प का पौधा देखकर वह बहुत चमत्कृत हुए। राजा ने वह पुष्प पौधा उगाने वाले वृक्ष के समीप जाकर पूजा की और भगवान विष्णु से पुत्र संतान के लिए आशीर्वाद मांगा।
रात्रि को राजा को स्वप्न में भगवान ने दिखाया कि वह वृक्ष पुष्प से मिलने वाले वर के रूप में पुत्र को प्राप्त करेंगे। जब राजा और रानी ने वह वृक्ष पूजा और व्रत की योजना बनाई, तो उन्हें दिव्य स्वरूप में विष्णु ने दर्शन किए और उन्हें अच्छे संतान के लिए आशीर्वाद दिया।
इस प्रकार राजा और रानी ने व्रत का पालन करते हुए पुत्र संतान को प्राप्त किया और उनका गर्भाधान संपन्न हुआ। उनके पुत्र का नाम 'पुत्रदा' रखा गया क्योंकि भगवान विष्णु के आशीर्वाद से ही उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी।
इस प्रकार, पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का समापन होता है, और इसका पालन करके भक्त भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, विशेषकर पुत्र संतान की कामना करते हैं।


पौष पुत्रदा एकादशी का महत्‍व
पुत्रदा एकादशी जैसा कि नाम से समझ में आता है कि पुत्र प्रदान करने वाली एकादशी। साल में पुत्रदा एकादशी दो बार आती है। पहली श्रावण मास में आती है और दूसरी पुत्रदा एकादशी पौष मास में आती है। इस एकादशी का व्रत इन दंपतियों के लिए खास माना गया है जो अभी तक संतान सुख से वंचित हैं। इस एकादशी का व्रत करने से उनकी खाली झोलियां भर जाती हैं। जो भक्‍त पूरी श्रृद्धा से इस व्रत को करते हैं उनको ईश्‍वर का आशीर्वाद प्राप्‍त होता है और उनकी सभी इच्‍छाएं पूर्ण होती हैं।
सनातन शास्त्रों में निहित है कि एकादशी व्रत करने से व्रती को अमोघ फल की प्राप्ति होती है। अगर आप भी भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा पाना चाहते हैं तो पुत्रदा एकादशी पर विष्णु जी की यह आरती जरूर करें। इससे घर में सुख और समृद्धि का आगमन होगा।
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

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