प्रदोष व्रत कथा: भगवान शिव की कृपा से मुक्ति की प्राप्ति

प्रदोष व्रत कथा: भगवान शिव की कृपा से मुक्ति की प्राप्ति

कृष्ण पक्ष प्रदोष व्रत की कथा भगवान शिव के श्रद्धालु भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां इस व्रत की कुछ मुख्य कथाएं हैं:

कथा 1: राजा मंदता और मृत्यु का वरदान

कहानी यहां से शुरू होती है कि एक समय एक राजा था जिनका नाम मंदता था। राजा मंदता बड़े धार्मिक और भगवान शिव के भक्त थे। उन्हें अपने राज्य में न्याय और शांति की प्राप्ति के लिए प्रदोष व्रत का आयोजन करने का आदान-प्रदान अत्यंत महत्वपूर्ण था।
एक दिन, राजा मंदता के दरबार में देवराज इंद्र ने आकर उनसे वर मांगा कि वह अमरता का आनंद लें। राजा ने इंद्र को यह वर देने का निर्णय किया, लेकिन उन्होंने इस वर को मृत्यु के बिना नहीं मांगने का निर्णय किया है।
राजा का यह निर्णय देवराज इंद्र को क्रोधित कर दिया और उसने राजा मंदता पर शाप दिया कि उन्हें एक वर्ष के भीतर मृत्यु होगी। राजा मंदता ने इस शाप को स्वीकार किया और वह जानते हुए भी अपनी मृत्यु की तैयारी करने लगे।
वह जब जानते कि उनका अंत आने वाला है, तो वह बहुतें तपस्या और पूजा-अर्चना करते रहे। उन्होंने अपने राज्यवासियों को धार्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और वे भी भगवान शिव की भक्ति में लिपटे।
प्रदोष व्रत के दिन, राजा मंदता ने विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा की और प्रदोष काल में उनकी आराधना की। उन्होंने अपनी प्राणों को भगवान शिव के चरणों में अर्पित करते हुए मृत्यु को प्राप्त किया।
इस प्रकार, भगवान शिव की कृपा से राजा मंदता ने मृत्यु को भी अपने अधीन कर लिया और अमरता का आनंद लिया। इस तरह से, प्रदोष व्रत ने राजा मंदता की जीवन की कड़ीयों को हल्का कर दिया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति का सुख दिलाया।

कथा 2: मरकट दमन कथा

एक समय की बात है, भगवान शिव और पार्वती माता की अलग-अलग पर्वतों पर अवस्थित अलग-अलग नामों से पूजा जा रही थी। पार्वती माता ने भगवान शिव से पूछा कि उनमें से कौन पूजा जाने वाला है?
इस पर भगवान शिव ने कहा कि जो व्रत प्रदोष के दिन श्रद्धा भाव से करेगा, उसका व्रत मुझसे जुड़ा होगा और वह मेरा परम भक्त माना जाएगा। इसके बाद, पार्वती माता ने भगवान शिव से यह भी पूछा कि प्रदोष के दिन कैसा व्रत करना चाहिए?
भगवान शिव ने एक कथा के रूप में यह व्रत करने की विधि बताई:
कई साल पहले, एक राजा था जिसका नाम रत्नदेव था। उसकी पत्नी का नाम सुमालिका था। वे बहुत धर्मात्मा और भगवान शिव के भक्त थे। एक बार, राजा रत्नदेव ने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की पूजा की। पूजा के दौरान उन्होंने भगवान शिव से यह व्रत करने की विधि सीखी।
उन्होंने अपनी पत्नी सुमालिका को भी इस व्रत की विधि सिखाई और उन्होंने सम्पूर्ण भक्ति भाव से व्रत किया। प्रदोष के दिन व्रत के दौरान, राजा रत्नदेव और रानी सुमालिका ने भगवान शिव की पूजा की और अपने मनोबल से शिवलिंग का सेवन किया। भगवान शिव ने देवी पार्वती की साथ बैठकर उनके व्रत को प्रसन्नता से स्वीकार किया और उन्हें अपने भक्त माना। भगवान शिव ने रत्नदेव और सुमालिका को वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन श्रद्धा भाव से करेगा, वह भगवान शिव का अत्यंत प्रिय भक्त होगा और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
इस प्रकार, प्रदोष व्रत का महत्वपूर्ण व्रत अनेक कथाओं और उपाख्यानों के साथ जुड़ा हुआ है, जो इसे भगवान शिव की अत्यंत कृपाशील और प्रिय पूजा बनाते हैं।

कृष्ण पक्ष प्रदोष व्रत आरती:

जय शिव ओंकारा...
जय शिव ओंकारा, हर हर महादेव।
ज्ञानी सखा सांकर, जय काशी विश्वनाथ।
जय गिरिजा पति दीनदयाल, सदा की निरंतर भक्त वत्सल।
जय शिव ओंकारा, हर हर महादेव।
ईश्वर सत्य है, शिव सत्य है...
ईश्वर सत्य है, शिव सत्य है।
माता पार्वती आराध्या, गंगाधर विराजत या है।
भक्तन की दुख-शोक हरने वाले, शंकर सत्य है, शिव सत्य है।
आरती उत्तार्ता री, मंगल मैंना बहु अपार।
हाथ न जोड़वा उसका, उत्तारे परमानंद स्वर।
आरती उत्तार्ता री, मंगल मैंना बहु अपार।
जय शिव ओंकारा...
जय शिव ओंकारा, हर हर महादेव।
ज्ञानी सखा सांकर, जय काशी विश्वनाथ।
जय गिरिजा पति दीनदयाल, सदा की निरंतर भक्त वत्सल।
जय शिव ओंकारा, हर हर महादेव।

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