जया एकादशी व्रत कथा: भगवान विष्णु के भक्त का उपासना और कृपा
जया एकादशी व्रत
सनातन धर्म में एकादशी का व्रत बहुत ही शुभ माना जाता है। इस व्रत को करने से प्राणी के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। इनमें से जया एकादशी इस जन्म और पूर्व जन्म के सभी पापों को नष्ट करने वाली सर्वोत्तम तिथि है। इतना ही नहीं, यह ब्रह्महत्या और राक्षसी आचरण जैसे जघन्य पापों को भी नष्ट करने वाला है। श्री विष्णु की प्रिय इस एकादशी का भक्तिपूर्वक व्रत करने से व्यक्ति को कभी पिशाच या भूत-प्रेत की योनि में नहीं जाना पड़ता और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस एकादशी के लिए पदमपुराण में कहा गया है कि जिसने 'जया एकादशी' का व्रत किया है, उसने सभी प्रकार के दान दिए हैं और सभी यज्ञ किए हैं। इस व्रत को करने से भक्त को अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
पुराणों में माघ माह को बहुत ही शुभ माह माना गया है। इस माह में स्नान और दान करना बहुत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि माघ माह में स्नान, दान और व्रत का फल अन्य महीनों की तुलना में अधिक मिलता है। इसके अलावा इस माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का भी विशेष महत्व बताया गया है। जया एकादशी का व्रत माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। यह व्रत आज यानी 20 फरवरी को मनाया जा रहा है. जया एकादशी का जिक्र करते हुए शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है उसे मरने के बाद भूत नहीं बनना पड़ता।
विधि, शुभ मुहूर्त.
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2024 में इस तिथि की शुरुआत 19 फरवरी को सुबह 8 बजे से 49 मिनट पर होगी और वहीं इसकी समाप्ति 20 फरवरी को सुबह 9 बजे से 55 मिनट पर होगी। जो जया 20 फरवरी को मनाई जाएगी। इस दिन आप व्रत रख सकते हैं और व्रत का पारण 21 फरवरी से सुबह 6 बजे तक 55 मिनट से 9 बजे तक 11 मिनट तक कर सकते हैं।
इस दिन साधक को सुबह स्नान करके सात्विक रहना चाहिए और भगवान विष्णु की मूर्ति को 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते हुए पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और वस्त्र, चंदन, जनेऊ, गंध, अक्षत, फूल, तिल अर्पित करना चाहिए। बीज, धूपबत्ती, नैवेद्य, मौसमी फल, पान, नारियल आदि चढ़ाकर कर्पूर से आरती करनी चाहिए। रात में और द्वादशी के दिन भगवान श्रीहरि का जागरण करें, गरीबों को भोजन कराएं और जरूरतमंदों की मदद करें। सात्विक भोजन करें और किसी भी प्रकार के विकारों से दूर रहें।
जया एकादशी कथा 1
प्राचीन काल में ब्राह्मण नामक एक तपस्वी ऋषि थे, जो भगवान विष्णु का भक्त था। उन्होंने अपनी तपस्या में विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा की थी। विशेष रूप से कारग्रीव नामक एक राक्षस ने रात्रि में उनकी पूजा को विघ्नित करने का प्रयास किया। तपस्वी ऋषि ने बहुत श्रम और ध्यान के बाद भगवान की कृपा से राक्षस को मार डाला।
भगवान विष्णु तब तात्कालिकी के रूप में प्रकट होकर तपस्वी ऋषि को आशीर्वाद दिया और उनसे एक विशेष एकादशी व्रत का अनुष्ठान करने को कहा। इसे जया एकादशी कहा गया, जो फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कहा जाता है।
जया एकादशी व्रत करने से तपस्वी ऋषि ने अपनी भक्ति में और भगवान विष्णु के प्रति अपने प्रेम में और भी बढ़ोतरी प्राप्त की।
जया एकादशी व्रत कथा 2
प्रागैतिहासिक दिनों में, नंदन वन में एक उत्सव आयोजित किया जाता था, जहां भिक्षु और ऋषि-मुनि एक दिन के लिए सभी देवताओं के साथ मंत्रोच्चार और उत्सव मनाते थे। इस उत्सव में माल्यवान नाम का एक गंधर्व गायक और पुष्यवती नाम की एक नर्तकी प्रदर्शन कर रहे थे। पुष्यवती माल्यवान की शारीरिक बनावट पर मोहित हो गई और उसे लुभाने का प्रयास करने लगी। इसने माल्यवान को प्रभावित किया, जो पुष्यवती की ओर आकर्षित हो गया और परिणामस्वरूप सुरताल के बारे में पूरी तरह से भूल गया। उनके संगीत में तालमेल के अभाव के कारण उत्सव का रंग फीका पड़ने लगा, जिससे देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने उन दोनों को पृथ्वी ग्रह पर निर्वासित कर दिया।
वह हिमालय के अंधेरे जंगलों में दोनों राक्षसों का जीवन जीने लगा। उसे अपने कुकर्मों पर पछतावा हुआ और इस दुष्ट जीवन पर पछतावा हुआ। माघ शुक्ल की जया एकादशी को उन दोनों ने केवल कन्द मूल खाया, और कुछ नहीं खाया और अपनी भूल की क्षमा माँगकर और फिर कभी ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करके एक पीपल के वृक्ष के नीचे सो गये। अगली सुबह जब वे जागे, तो उन्होंने खुद को अपने भयानक जीवन से राहत पाया, इस तथ्य से अनजान थे कि यह जया एकादशी थी और अनजाने में उन्होंने इसका व्रत कर लिया। तो उन पर भगवान विष्णु की कृपा हुई और वे दोनों राक्षस योनि से मुक्त हो गए। माल्यवान और पुष्यवती को स्वर्ग की ओर जाते देखकर आश्चर्यचकित होकर, उन्होंने दोनों से श्राप से मुक्ति के बारे में पूछा। फिर वह जया एकादशी व्रत के प्रभाव के बारे में बात करते हैं। तब से, लोग मानते हैं कि जया एकादशी का व्रत करने से उनके पाप धुल जाते हैं।
जया एकादशी की आरती:
आरती के दौरान जया एकादशी के व्रती भक्त विशेष रूप से भगवान विष्णु की महिमा और कृपा का गान करते हैं। आरती में उन्हें भगवान के लीलाएं और महत्वपूर्ण कारण याद करने का मौका मिलता है।
एक सामान्य जया एकादशी आरती
जया एकादशी की जय, कृपा दृष्टि करो
हरि नाम संकीर्तन से, जीवन को संवारो
हरि भक्ति बढ़ाओ, दुःखों को हम से हरो
विष्णु भगवान की आरती, करो हम सब एक साथ
जया एकादशी के दिन, शुभ दिन यह आया
भगवान विष्णु की पूजा, हो जाए समर्पित हमारा
उपवास करते हैं भक्त, जीवन को बनाते सुंदर
भगवान की आराधना में, होती रहे सदा बहुतर
जया एकादशी के दिन, धरती पर आई विशेष
भगवान विष्णु की कृपा, सभी को मिले रहे आशीर्वाद
पुण्य का बंधन हो, जीवन में लाए उत्तम
जया एकादशी की आरती, करते हैं भक्ति से उत्साह
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