माता संतोषी केजन्म की कहानी

माता संतोषी केजन्म  की कहानी

संतोषी माता एक देवी

संतोषी माता को धर्म में एक देवी हैं जो भगवान शंकर तथा देवी पार्वती की पौत्री , उनके सबसे छोटे पुत्र भगवान गणेश और गणेश की पत्नी ऋद्धि , सिद्धि की पुत्री , कार्तिकेय , अशोकसुन्दरी , अय्यापा , ज्योति और मनसा की भतीजी और शुभ , लाभ की बहन तथा संतोष की देवी हैं। इनका दिवस शुक्रवार माना गया है।मां संतोषी को आश्चिका नाम से भी जाना जाता है। इन्हें खीर तथा गुड़ चने का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

दुर्गा का अवतार

माता संतोषी को दुर्गा का अवतार भी माना जाता है। इसी के साथ माता संतोषी के जन्म को लेकर ये दुविधा रहती है कि वो भगवान गणेश की पुत्री हैं। भगवान गणेश को बल, बुद्धि और विद्या का देवता माना जाता है।

संतोषी माता के पिता गणेश और माता रिद्धि-सिद्धि धन, धान्य, सोना, चांदी, मूंगा, रत्नों और ज्ञान से भरा पूरा परिवार है। इसलिए उनकी प्रसन्न्ता परिवार में सुख-शान्ति तथा मनोंकामनाओं की पूर्ति कर शोक विपत्ति चिन्ता परेशानियों को दूर कर देती हैं। सुख-सौभाग्य की कामना से माता संतोषी के 16 शुक्रवार तक व्रत किये जाने का विधान है।

माता संतोषी की उत्पत्ति

पौराणिक ग्रंथों में इस कथा के लिए कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। मान्यताओं के आधार पर कहा जाता है कि गणेश के दो पुत्रों के साथ एक पुत्री भी थीं जिनका नाम माता संतोषी था। भगवान गणेश की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि थीं जिनसे उन्हें दो पुत्र शुभ और लाभ हुए। माना जाता है कि भगवान गणेश अपनी बुआ से रक्षा सूत्र बंधवा रहे थे और इसके बाद तोहफों का लेन-देन देखने के बाद गणेश जी के पुत्रों ने इस रस्म का रहस्य पूछा। इस पर गणेश ने बताया कि ये धागा नहीं है बल्कि एक सुरक्षा कवच है, आशीर्वाद और बहन भाई के प्रेम का प्रतीक है।

इस पर गणेश के पुत्र शुभ और लाभ ने इच्छा व्यक्त करी कि उन्हें भी एक बहन चाहिए। जिससे वो रक्षासूत्र बंधवा सकें। इसके बाद भगवान गणेश ने अपनी विशेष शक्तियों से एक ज्योति उत्पन्न की और उनकी दोनों पत्नियों की आत्मशक्ति के साथ उसे सम्मलित कर लिया। इस ज्योति ने कन्या का रुप धारण कर लिया और गणेश की पुत्री का जन्म हुआ। जिसे संतोषी माता का नाम दिया गया और शुभ-लाभ की बहन बनाया गया।

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