शनिवार को शनिवार व्रत करें साढ़े साती से मिलेगी मुक्ति
शनिवार को शनिवार व्रत करें साढ़े साती से मिलेगी मुक्ति
शनि देव की पूजा विधि
- इस व्रत को रखने के लिए सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान कर लें
- इसके बाद साफ कपड़े पहनकर पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएं
- इसके बाद लोहे से बनी शनिदेव की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाएं
- इसके बाद शनि देव की पूजा करके शनि व्रत कथा और चालीसा का पढ़ें
शनिवार व्रत के नियम
इस जिन शनि देव की पूजा जरूर करें
पूजा करते हुए उन्हें काली चीज अर्पित जरूर करें
सरसों के तेल का दीपक जरूर जलाएं
मांस, मदिर जैसी चीजों से दूर रहें
लोहे की चीज इस दिन न खरीदें, हो सके तो शनि मंदिर में लोहे की चीज का दान जरूर करें
जो भी लोग शनिवार को व्रत करते हैं वो शनिदेव से जुड़े मंत्रों का जाप करें और शाम के समय शनि कथा भी जरूर पढ़ें
इस दिन काले वस्त्र धारण करें
रात के समय केवल फलों का सेवन करें
हो सके तो पीपले के पेड़ की पूजा भी आप शनिवार को करें
अगले दिन शनिदेव की पूजा करने के बाद ही अपने व्रत को तोड़
शनिवार व्रत कथा
आज्ञा दी गुरुदेव ने, दीना शीश झुकाय।
कथा कहु शनिदेव की, भाषा सरल बनाया।।
सर्वप्रथम श्री सरस्वती को सुमिरन करके, गणपति जी को नमस्कार करके तथा अपने गुरुदेव 2 के चरणों में माथा नवाकर मैं श्री शनिदेव जी की कथा प्रारम्भ करता हूं। यह शनि शनिदेव जो मनवांछित कार्यों को सफल बनाने वाले हैं तथा जिन्हें सकल नर-नारी और तैंतीस कोटि देवता, योगीश्वर, मुनीश्वर ध्याते हैं वही देव मेरी त्रुटियों को क्षमा करें और मुझे अपनी शरण में लें। मेरे मन में आपके प्रति अगाध प्रेम है। यह बात सर्वविदित है कि जो लोग शनिदेव को ध्याते हैं उनके सकल मनोरथ सफल होते हैं तथा जो ऐसे देव को भूल जाता है वह इस संसार में महान दुख पाता 12 हुआ नरकगामी होता है और अगले जन्म में पशु की योनि में जाता है। जो कथा मैं तन-मन से कहने जा रहा हूं उसे आप भी सच्चे मन से ग्रहण करें। एक बार संसार में चहुँ ओर पूजे जाने वाले नवग्रह एक स्थान पर एकत्र हुए। परस्पर विविध 4 प्रकार से वार्तालाप करने लगे। जब बात घूमती हुई उस स्थान पर आ पहुंची कि हम नवग्रहों में सबसे बड़ा और सर्वाधिक पूजनीय कौन देव है तो प्रत्येक ग्रह देवता स्वयं को बड़ा कहने लगे। इस बात पर जब बहुत देर तक वाद-विवाद होता रहा और कोई निर्णय नहीं हो सका तो यह तय हुआ कि चलकर इन्द्र से इसका निर्णय कराना चाहिये। अतः वह नौ के नौ ग्रह इन्द्रदेव के समक्ष उपस्थित हुए।
उन सबकी बातें सुनकर इन्द्रदेव भी सोच में पड़ गये। किसे छोटा कहूं और किसे बड़ा? किमकी श्रद्धा के पात्र बनें और किसके कोप के भाजन। अन्त में सोच समझकर निर्णय न करते हुए वह बोले मैं अल्प बुद्धि इस बात का निर्णय करने में असमर्थ हूं। मुझे तो आप सभी बड़े नजर आते हैं और मैं सभी का आदर-सम्मान समभाव से करता हूं। इस पर नवग्रह संतुष्ट नहीं हुए और हठ करने लगे कि इसका निर्णय आपको अवश्य करना चाहिये। तब देवराज बोले आप लोग मृत्यु लोक में जाइये। वहां एक अत्यंत न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य राज्य करता है। आप उनके पास जाइये वह अवश्य आपका कोई-न-कोई उचित निर्णय कर देगा।
इन्द्र से निराश होकर नवग्रह मृत्यु लोक में जाने को तत्पर गये। देवराज इन्द्र ने जब उन्हें वहां जाते देखा तो प्रसन्न होकर चैन की साँस ली। इस धर्म संकट से निकलना उनके लिए सचमुच ही कितना दुश्वार था, पर अपनी चतुराई से अपने ऊपर आये संकट को राजा विक्रमादित्य पर टाल दिया। उज्जैन नगरी की उन दिनों सारे ही भारत में धाक थी। एक तो वहां राजा विक्रमादित्य के दरबार में बड़े-बड़े ज्ञानवान लोगों का सम्मेलन होता रहता था दूसरे उस न्याय-प्रिय राजा के न्याय से उज्जैन नगरी का सारे भारत में डंका बजता था। स्वर्ग में जब नवग्रहों का निर्णय न हो पाया तो वह अपने-अपने विमानों पर आरूढ़ हो मृत्युलोक में आ पहुंचे।
ठीक उस समय जब राजा विक्रमादित्य का दरबार ठसाठस भरा हुआ था, तब नवग्रह वहां जा पहुंचे। नवग्रहों को इकट्ठे देखकर विक्रमादित्य अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और सभी देवों को सम्मान पूर्वक आसन ग्रहण करने को कहा। किन्तु राजा के इस सम्मान को किसी भी ग्रह देवता ने स्वीकार नहीं किया तब विक्रमादित्य ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा तो बृहस्पति देव ने आगे बढ़कर दृढ़-स्वर में कहा-हे राजन् ! हम यहां पर तब तक आसन ग्रहण नहीं करेंगे जब तक कि आप हमारा यह निर्णय नहीं करेंगे कि हम लोगों में सबसे बड़ा कौन है?
राजा अपने ऊपर आये इस धर्म संकट को देखकर पलभर को तो घबरा गया परन्तु शीघ्र ही उसने स्वयं को सम्भाल लिया। उसने अपने मन में एक युक्ति सोच ली। दरबार में छोटे-छोटे आसनों की एक पंक्ति प्रवेशद्वार तक चली गई थी। राजा ने उन लोगों से कहा कि आप यहां पर आसन ग्रहण कीजिए और मैं सोचकर अभी अपना निर्णय करता हूं। यह कहकर राजा अपने सिंहासन पर बैठ गया। सिंहासन के निकट ही जो आसन पड़ा था उस पर भागकर बृहस्पतिदेव जा बैठे। उनके अगले आसन पर सूर्य देव जा बैठे। सूर्य के निकट ही चन्द्रमा और फिर इसी क्रम में बुध, मंगल, राहु, केतु इत्यादि ने भी अपना-अपना आसन ग्रहण कर लिया। पंक्ति में आठवें थे भार्गव किन्तु उन्हें भी संतोष था कि उनके बाद शनिश्चर बैठेंगे। किंतु आसन प्रवेशद्वार के समीप होने के कारण और सबसे अंत में होने के कारण शनिदेव उस पर नहीं बैठे।
राजा विक्रमादित्य ने सोचा था कि जो ग्रह उस अन्तिम आसन पर बैठेगा वह उसी को विनय और दयाशील के आधार पर बड़ा कह देंगे। पर वहां तो बात ही दूसरी हो गई। शनिदेव अति क्रोधी और विकट स्वभाव के देवता हैं। जब वह नहीं बैठे तो आठों ग्रह खिलखिलाकर हंस पड़े। अपना इस प्रकार से अपमान होते देखकर शनिदेव की आंखें क्रोध से लाल हो गईं और भृकुटी तन गई। क्रोध से काँपते हुए बोले राजन! मुझसे वैर लेकर तुमने अच्छा नहीं किया। क्या समझ कर तुमने मुझे इस प्रकार से अपमानित करना चाहा है और क्यों मुझे तले बिठाना चाहा है। चांद ग्रह का प्रभाव सवा दो दिन रहता है और सूर्य, शुक्र और बुध का प्रभाव केवल आधा मास। सोम और मंगल दो मास और गुरु तेरह मास। राहु और केतु अठारह मास रहते हैं, जबकि मैं साढ़े सात वर्ष तक रहता हूं। इसलिए हे राजन अब तू सावधान हो जा। तूने जो अपमान किया है इसका दण्ड तुझे अवश्य मिलेगा। राजा के कुछ दिन तो आराम से बीते लेकिन शीघ्र ही शनिदेव की कोप दृष्टि फिरी और राजा पर साढ़ेसाती आ गई। उन्हीं दिनों एक व्यापारी कुछ घोड़े बेचने के लिए उज्जैन नगरी में आया। सुन्दर-सुन्दर घोड़े
देखकर राजा का जी ललचा गया। राजा ने उन्हें खरीदने का आदेश दिया। घोड़ों में एक घोड़ा भंवर नाम का था। राजा उस पर चढ़कर देखने लगे। कुछ देर तक तो घोड़ा राजा को लिये वहीं घूमता रहा लेकिन फिर सहसा भाग खड़ा हुआ। राजा को बड़ा अचंभा हुआ। घोड़ा एक भयानक जंगल में राजा को पटककर अंतर्ध्यान हो गया। राजा अकेला उस वीरान जंगल में भटकने लगा। सायं के समय जब उसे प्यास बहुत सताने लगी तो वह जोर-जोर से चीखने लगा। उधर एक पगडंडी से एक ग्वाला अपने गांव को जा रहा था। वह राजा की आवाज सुनकर रुक गया। राजा उसके पास गया। ग्वाले ने उसकी व्यथा जानकर उसे निकट की नदी पर ले जाकर पानी पिलाया। पानी पीने के बाद राजा स्वस्थ हो गया और प्रसन्न होकर उसने ग्वाले को अपने हाथ की अंगूठी उतारकर दे दी और उससे कहा कि मैं उज्जैन का रहने वाला हूं। यहां रास्ता भटक गया हूं। तुम मुझे रास्ता दिखाओ। तब ग्वाला उसे अपने साथ गांव में लाया। वहां एक मिष्ठान की दुकान पर राजा ने मिठाई खा-पीकर भूख मिटाई और दुकानदार को भी एक अंगूठी उतार कर दे दी। दुकानदार के पूछने पर उसने उससे भी यही कहा कि वह उज्जैन नगरी का रहने वाला है और उसका नाम बोना है। फिर वह दुकान के बन्द होने तक वहीं बैठा दुकानदार से बातें करता रहा। उस दिन दुकानदार की बिक्री बहुत हो गई।
उसने सोचा यह भाग्यवान पुरुष है जो इसके आने से आज मेरी इतनी बिक्री हुई है। इसलिये रात होने पर वह उससे बोला कि वह उसके साथ उसके घर चले और उसके साथ ही भोजन भी करे। राजा मान गया। जब वह दोनों घर पर पहुंचे तो दुकानदार की पत्नी ने उनका बड़ा स्वागत सत्कार किया और अतिथि के लिए विशेष रूप से भोजन तैयार किया। भोजन करते समय एक अद्भुत घटना घटी। जहां राजा भोजन कर रहा था वहीं सामने की दीवार पर सोने का एक सतलड़ा चित्र था। सहसा ही वह हार टंगा हुआ था। उसके पीछे एक वहां से अदृश्य हो गया। दुकानदार के यहां एक बांदी थी। उसने जाकर घर की मालकिन से कहा-वहां खूटी पर हार नहीं है।
जब बात दुकानदार तक पहुंची तो उसने राजा से पूछा। राजा बोला-मुझे तो नहीं मालूम। तुम्हारे और मेरे अतिरिक्त तो यहां कोई था ही नहीं। सच-सच बताओ हार कहां है? मुझे नहीं मालूम। राजा फिर बोला-मेरे पास कोई हार नहीं है। जब कोई निर्णय नहीं हो सका तो दुकानदार राजा को उस नगर के राजा के पास ले गया। उस नगर के राजा ने जब विक्रमादित्य की भोली-भाली सूरत देखी तो बोला-यह व्यक्ति कभी भी चोरी नहीं कर सकता और यह कहकर उसने विक्रमादित्य को छोड़ दिया। विक्रमादित्य जब उसे नगर में यूं ही इधर-उधर घूम रहा था तब उस नगर के एक तेली ने उससे कहा कि वह उसके यहां काम कर ले तो उसे वह रहने को स्थान और खाने को सामग्री भी देगा। राजा मान गया और तेली उसे अपने घर ले आया। वहां सारा दिन राजा धाणी पर बैठा उसके बैलों को हांकता रहता और तेली बाजार में तेल बेच आता।
जब वर्षा ऋतु आई और मूसलाधार वर्षा होने लगी तब धाणी पर बैठे हुए विक्रमादित्य ने मौज में आकर ऊंचे-ऊंचे स्वर में राग अलापना आरम्भ कर दिया। निकट ही उस नगर के राजा का राजमहल था। वहां खिड़की में बैठी राजकुमारी ने जब राजा का मधुर स्वर में गीत सुना तो वह अपना दिल हार बैठी। उसने बांदी को पता करने के लिए भेजा। बांदी वहां राजा को गाते हुए देखकर लौटी तो राजकुमारी से बोली कि वहां पर तो कोई अति सुकुमार नवयुवक बैठा मस्ती में आँखें बन्द किये गा रहा है। राजकुमारी ने सुना तो उसने अन्न जल का त्याग कर दिया। रात तक जब उसने कुछ नहीं खाया तो रानी ने आकर उसे समझाया। पर वह बोली कि वह तो उस गाने वाले से ही शादी करेगी। रानी ने जाकर राजा से कहा कि राजकुमारी एक तेली पर मोहित हो गई है और उससे ब्याह रचाना चाहती है। राजा ने सुना तो बहुत युद्ध हुआ। उसने तेली के घर से विक्रमादित्य को बुलाया और उसके हाथ काटकर जंगल में फिकवा दिये। यह बात जब म राजकुमारी को पता चली तो वह और भी अपनी बात पर दृढ़ हो गई। बोली मैंने तो अब उसी को वर लिया है वह चाहे कैसा भी हो उसी से विवाह करूंगी। बेटी की हठ देखकर लाचार हो राजा ने दोबारा विक्रमादित्य को नगर में बुलवाया और उससे राजकुमारी का मामूली ढंग से पाणिग्रहण कराया और एक साधारण मकान में दोनों को बसा दिया। दोनों वहीं रहने लगे।
एक दिन जब विक्रमादित्य सोया था तो स्वप्न में उसे शनिदेव नजर आये। विक्रमादित्य ने उनके सामने नमस्कार किया और क्षमा याचना की। शनिदेव ने उसे आशीर्वाद दिया और बोले-अब तुम्हारी साढ़ेसाती ( साढ़े सात वर्ष) खत्म हो गई है। राजा बोला-मुझसे जो गलती हुई उसके लिये मुझे क्षमा कर दीजिए। शनिदेव ने मुस्करा कर उसे आशीर्वाद दिया और राजा के दोनों बाजू दोबारा निकल आए।
राजा ने अपनी पत्नी राजकुमारी को रात को जगाया नहीं। वह रात को उसके गले में अपनी बाहें डालकर सो गया। सुबह राजकुमारी की आँख खुली तो उसने अपनी गर्दन में बाहें पड़ी देखीं तो वह चौंककर उठ बैठी। लेकिन शीघ्र ही विक्रमादित्य ने जागकर उसको सब बातों से अवगत करा दिया। जब वहां के राजा को यह बात मालूम हुई तो वह भागा-भागा आया और उस अपंग को फिर से स्वस्थ देखकर चकित रह गया। उसको भी विक्रमादित्य ने यही कहा कि यह सब शनिदेव की कृपा का फल है और विक्रमादित्य ने अपना वास्तविक परिचय भी उस राजा को दिया और सारा किस्सा विस्तार से सुनाया। सुनते ही राजा विक्रमादित्य के चरणों में गिर गया और क्षमा याचना करने लगा। बस यह खबर शीघ्र ही सारे नगर में फैल गई। दुकानदार को जब यह खबर मिली तो वह भागा-भागा आया और विक्रमादित्य के पांवों पर लोटने लगा। विक्रमादित्य ने उसे उठाकर आसन पर बिठाया और कहा-तुम घर जाकर उसी खूंटी पर देखो हार टंगा होगा और सच ही दुकानदार ने देखा हार टंगा पाया।
राजा ने नौकरानियों के साथ लश्कर समेत विक्रमादित्य को विदा किया। राजा विक्रमादित्य जब राजकुमारी को लेकर अपनी नगरी उज्जैन में लश्कर समेत पहुँचा तो सारी नगरी में उत्साह छा गया। अपने राजमहल में प्रवेश करने से पूर्व विक्रमादित्य ने नवग्रहों की पूजा की और शनिदेव को सर्वोच्च स्थान दिया। साथ ही उसने नगर भर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि शनिदेव मनोवांछित फलों को देने वाले हैं और नवग्रहों में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। इस प्रकार शनिदेव को मनाकर विक्रमादित्य ने अपने राज्य, यश और कीर्ति को प्राप्त कर लिया।
बोलो श्री शनिदेव की जय। बोलो श्री नवग्रहों की जय।।
दोहा -
जैसी सुनी तैसी कही, इसमें झूठ न सांच।
विक्रम भूप इतिहास को, सज्जनों देखो बांच।।
सुने सुनावे शनि कथा, गावे जो चित्तलाय।
सत्य वचन है संत का, वाको संकट जाय।।
शनि दोष से बचने के लिए
एक बार सभी नौ ग्रहों में इस बात को लेकर होड़ मची की कौन सबसे बड़ा और ताकतवर ग्रह है।
सभी ग्रह इस बात का निर्णय जानने के लिए राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे जो बहुत न्यायप्रिय थे।
विक्रमादित्य ने नव ग्रहों की बात सुनी और नौ सिंहासन का निर्माण करवाकर उन्हें क्रम से रख दिया।
वह नौ सिंहासन सुवर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से निर्मित थे।
राजा ने शर्त रखी कि इस सिंहासन पर सभी नव ग्रह अपने आप स्वेच्छा से विराजित हो जाएं।
साथ ही, यह भी बताया कि जो ग्रह आखिर में सिंहासन पर बैठेंगे वो ग्रह सबसे छोटे कहलाएंगे।
इस शर्त के कारण आखिर में शनि देव (शनिदेव के प्रसन्न होने के संकेत) ने सिंहासन ग्रहण किया और वह सबसे छोटे ग्रह माने गए।
शनि देव इससे क्रोधित हो गए और राजा को सावधान रहने के लिए बोलकर नाराज होकर चले गए।
शीघ्र ही राजा की साढ़े साती शुरू हो हुई। राजा का जंगल में भूखे-प्यासे भटकना शुरू हो गया।
राजा के साथ एक के बाद एक बुरा होता चला गया। एक समय आया जब राजा अपांग हो गया।
तब शनि देव ने राजा को दर्शन दिए और राजा को अपने द्वारा दी गई चेतावनी का अहसास कराया।
राजा ने शनि देव से क्षमा मांगी तब शनी देव ने राजा को साढ़े साती से मुक्ति का उपाय बताया।
शनि देव ने राजा को शनिवार का व्रत रखने और इस दिन चींटियों को आटा खिलाने के लिए कहा।
राजा ने ऐसा ही किया और धीरे-धीरे शनिदेव का क्रोध शांत हो गया। शनि देव प्रसन्न हुए।
शनिदेव ने राजा के सभी कष्ट हर उन्हें जीवन के सारे भौतिक सुखों का आनंद दिया।
शनिदेव की आरती
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
जय जय श्री शनि देव।
श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
जय जय श्री शनि देव।
क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥
जय जय श्री शनि देव।
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥
जय जय श्री शनि देव।
देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥
जय जय श्री शनि देव।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
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महालक्ष्मी व्रत: व्रत उद्यापन और पूजा विधि
महालक्ष्मी व्रत: व्रत उद्यापन और पूजा विधि महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शुरू होता है और आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को समाप्त होता है। यह व्रत कुल 16 दिनों तक चलता...
शुक्ल प्रदोष व्रत: भगवान शिव को समर्पित महत्वपूर्ण हिन्दू व्रत
शुक्ल प्रदोष व्रत, हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण एक व्रत है जो भगवान शिव को समर्पित है। इस व्रत को शुक्ल पक्ष के प्रदोष तिथि को मनाया जाता है, जो हिन्दू पंचांग के अनुसार हर मास के दूसरे तिथि होता है।...
श्री मन नारायण नारायण नारायण। भजन
श्री मन नारायण नारायण नारायण। भजन भजमन नारायण नारायण नारायण।। श्री मन नारायण नारायण नारायण ,ॐ नारायण नारायण नारायण। लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण,ॐ नारायण नारायण नारायण।। गज और...
श्री गणेश जी की आरती, पूजा और स्तुति मंत्र
श्री गणेश जी की आरती जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥ एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥ जय गणेश,...
गणेश चतुर्थी 2023: विनायक चतुर्दशी पूजा की तिथि, समय और मुहूर्त
गणेश चतुर्थी 2023: विनायक चतुर्दशी की तिथि, समय और मुहूर्त हिंदू कैलेंडर के अनुसार, विनायक चतुर्दशी 2023 सोमवार, 18 सितंबर को दोपहर 12:39 बजे शुरू होगी और मंगलवार, 19 सितंबर को रात 8:43 बजे समाप्त होगी। इसके अलावा,...
रवि पुष्य नक्षत्र
रवि पुष्य नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है जो समृद्धि और सौभाग्य चाहने वाले व्यक्तियों के लिए अत्यधिक महत्व रखती है। आइए रवि पुष्य नक्षत्र की गहराई में उतरें और इसके लाभों,...
मां कालरात्रि के पूजन मुहूर्त, मंत्र, पूजा विधि और आरती
शारदीय नवरात्रि का 21 अक्टूबर 2023, शनिवार को सातवां दिन है। यह दिन मां कालरात्रि को समर्पित है। मां कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह काला है। मां की श्वास से आग निकलती है। मां के बाल बड़े और बिखरे हुए...
हनुमान चालीसा के सभी दोहों और चौपाइयों का अर्थ हिंदी में ?
दोहा श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि । बरनउ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार । बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार॥ अर्थ : इन पंक्तियों...
माघ पूर्णिमा : आत्मा की प्रकाश की पूर्णिमा या धार्मिक समर्पण की पूर्णिमा
माघ पूर्णिमा व्रत एक हिन्दू धार्मिक व्रत है जो माघ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत हिन्दू परम्परा में महत्वपूर्ण माना जाता है और इसे संगीत, ध्यान, धर्मिक कार्यों, और दान-धर्म के रूप...
मकर संक्रांति दीप्तिमान आनंदोत्सव 2024
संक्रांति का अर्थ प्रत्येक महीने के अंतिम दिन को संक्रांति के रूप में जाना जाता है जो एक महीने के बढ़ने या ख़त्म होने और दूसरे की शुरुआत का प्रतीक है। यह सूर्य-देवता की पूजा है जो पृथ्वी पर जीवन...
सावन का महीना शिवजी की अराधना के लिए समर्पित
से शुरू हो रहा है सावन 2023 इस बार सावन का महीना करीब 2 महीने का होने वाला है। इस बार सावन महीने की शुरुआत 4 जुलाई 2023 से हो रही है और 31 अगस्त 2023 को इसका समापन होगा। यानी इस बार भक्तों को भगवान शिव की उपासना...
वीर हनुमाना अति बलवाना राम नाम रसियो रे,प्रभु मन बसियो रे भजन हिंदी लिरिक्स
वीर हनुमाना अति बलवाना राम नाम रसियो रे,प्रभु मन बसियो रे भजन हिंदी लिरिक्स भक्ति भजन गीत विवरण गीत: - वीर हनुमान अति बलवाना, गायक: - नरिश नरशी, गीत: - नरिश नरशी वीर हनुमाना अति बलवाना, राम नाम रसियो...
जानिए क्यों ? गोस्वामी तुलसीदास ने कारावास में 'लिखी हनुमान चालीसा' !
एक बार अकबर ने गोस्वामी जी को अपने दरबार में बुलाया और उनसे कहा कि मुझे भगवान श्रीराम से मिलवाओ। तब तुलसीदास जी ने कहा कि भगवान श्री राम सिर्फ अपने भक्तों को ही दर्शन देते हैं। यह सुनते ही अकबर ने...
संकटमोचन हनुमान अष्टक
बाल समय रवि भक्षी लियो तब तीनहुं लोक भयो अंधियारों ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो देवन आनि करी बिनती तब छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो को नहीं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम...
परिणय सूत्र में बंधे थे श्री राम-जानकी, विवाह पंचमी 2023
2023: हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार विवाह पंचमी 2023 के शुभ अवसर पर भगवान श्री राम तथा माता सीता का विवाह हुआ था| विवाह पंचमी 2023 का त्यौहार मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता...
भाई दूज 2023
भाई दूज दिवाली के बाद दूसरे दिन मनाया जाता है। भाई दूज का अर्थ नाम में ही दर्शाया गया है, क्योंकि यह एक भाई और एक बहन के बीच प्यार के रिश्ते को दर्शाता है। इस दिन एक बहन अपने भाई की सफलता और समृद्धि...
गुरु पूर्णिमा का इतिहास, तिथिऔर लोग गुरु पूर्णिमा कैसे मनाते हैं?
गुरु पूर्णिमा एक राष्ट्रीय व्यापी पर्व है जो इस संसार में गुरु के प्रति समर्पित है। गुरु शब्द का प्रयोग उस शिक्षक के लिए किया जाता है जो विद्यार्थी को कुछ भी सिखाता है। यदि हम इसे प्राचीन काल से...
गुरुवार व्रत की कथा और आरती
गुरूवार व्रत की कथा प्राचीन समय की बात है. किसी राज्य में एक बड़ा प्रतापी तथा दानी राजा राज्य करता था. वह प्रत्येक गुरूवार को व्रत रखता एवं भूखे और गरीबों को दान देकर पुण्य प्राप्त करता था परन्तु...
गौरी तपो व्रत
गौरी तपो व्रत हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने सबसे पहले भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए यह व्रत रखा था। वर्षों की 'तपो' के बाद अंततः उसे उसकी इच्छाएँ पूरी हुईं। तब से, उनके...
भगवान शिव की कृपा: मासिक शिवरात्रि के पर्व का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
मासिक शिवरात्रि, हिन्दू धर्म में हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली एक विशेष शिवरात्रि है। इसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इसे हर माह मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव की...
महागौरी की कथा, मंत्र, ध्यान मंत्र, बीज मंत्र, स्तोत्र और आरती
शिवपुराण के अनुसार, महागौरी को आठ साल की उम्र में ही अपने पूर्व जन्म की घटनाओं का आभास होने लग गया था। उन्होंने इसी उम्र से ही भगवान शिव को अपना पति मान लिया था और शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या...
