सती अनुसुइया ने ब्रह्मा,विष्णु,महेश को शिशु बनाया

सती अनुसुइया ने ब्रह्मा,विष्णु,महेश को शिशु बनाया

सती अनुसुइया ने ब्रह्मा,विष्णु,महेश को शिशु बनाया

सती अनुसुइया महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। अत्रि ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और सप्तऋषियों में से एक थे। अनुसुइया का स्थान भारतवर्ष की सती-साध्वी नारियों में बहुत ऊँचा है। इनका जन्म अत्यन्त उच्च कुल में हुआ था। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि को इन्होंने पति के रूप में प्राप्त किया था। अत्रि मुनि की पत्नी जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थीं। इन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सेवा करके उन्हें प्रसन्न किया और ये त्रिदेव क्रमश: सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा के नाम से उनके पुत्र बने। अनुसुइया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी।

इस प्रसंग को पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इस तरह प्रस्तुत किया है-

अनुसुइया के पद गहि सीता । मिली बहोरि सुशील विनीता।।

ऋषि पत्नी मन सुख अधिकाई। आशीष देई निकट बैठाई।।

दिव्य वसन भूषण पहिराये। जे नित नूतन अमल सुहाये।।

पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा

इसी आश्रम में सतीअनुसुइया ने उनके पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लेने आये ब्रह्मा.विष्णु.महेश को शिशु बना दिया था।

महर्षि अत्रि एवं माता सती अनुसुइया के आश्रम से पयस्विनी या मंदाकिनी नदी निकली है। ऐसा कहा एसा कहा जाता है कि सती अनुसुइया ने अपने तपोबल से मंदाकिनी को उत्पन्न किया था। तुलसीदास जी ने राममचरितमानस में इसके बारे में लिखा है कि-

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तप बल आनी। कहा यह जाता है कि अत्रि मुनि गंगा स्नान के लिए प्रतिदिन प्रयागराज जाते थे। यह देख कर अनुसुइया ने एक बार ध्यानस्थ होकर कहा कि अगर मेरे तपोबल में शक्ति है तो गंगा को यहां हमारे आश्रम के पहाड़ से निकलना होगा। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से पहाड़ से निकले स्रोत ने नदी का रूप ले लिया जो मंदिकनी या पयस्वनी कहलायी। आपके इस यूट्यूबर राजेश त्रिपाठी ने कभी स्वयं पहाड़ की तलहटी से निकलते स्रोत से बनती नदी देखी थी। 2016 में अपनी तीसरी चित्रकूट यात्रा में पाया अब वह स्रोत नहीं दिखते क्योंकि एक बार आयी विनाशक बाढ़ ने वहां का भूगोल ही बदल दिया। वे स्रोत खो गये हालांकि नदी के तट में सीमेंट के घेरे में कुछ स्रोत सुरक्षित रखे गये हैं। सुरम्य वनांचल और पहाड़ों से घिरा यह आश्रम बहुत ही सुरम्य है। बाढ़ में पुराना अनुसइया आश्रम भी क्षतिग्रस्त हो गया था उसके स्थान पर भव्य मंदिर बनाया गया है। इस भव्य मंदिर का जो वीडियो आप यहां देख रहे हैं वह इस यूट्यूबर ने 2016 में अनुसूइया आश्रम में बनाया था। वीडियो में भव्य मंदिर के सामने प्रवाहमान मंदाकिनी नदी परिलक्षित है। अनुसुइया आश्रम चित्रकूट धाम के रामघाट से 18 किलोमीटर की दूरी पर है।

मूल प्रसंग

आश्रम में अनुसुइया ने तीन देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अपनी दिव्य शक्ति से बाल स्वरूप बना कर पलने में पौढ़ा दिया था। क्योंकि ये तीनों माँ अनुसुइया की परीक्षा लेने आये थे। सती अनुसुइया द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बालक बना देने और अपना दुग्धपान कराने की कथा इस प्रकार है। एक बार नारदजी विचरण कर रहे थे तभी उन्होंने तीनों देवियां मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को आपस में कुछ विमर्श करते देखा। तीनों देवियां अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा कर रही थीं। नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसुइया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया। नारद जी बोले कि अनुसुइया के समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। तीनों देवियों को मन में अनुसुइया के प्रति ईर्ष्या होने लगी। तीनों देवियों ने सती अनुसुइया के पातिव्रत्य को खंडित करने के लिए अपने पतियों से कहा तीनों ने उन्हें बहुत समझाया पर पर वे नहीं मानीं।

विशेष आग्रह करने पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनुसुइया के सतीत्व और ब्रह्मशक्ति को परखने की बात सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने संन्यासियों का भेष धारण किया और अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंच कर भिक्षा मांगने लगे।

अतिथि-सत्कार की परंपरा के चलते सती अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत कर उन्हें खाने के लिए निमंत्रित किया। लेकिन संन्यासियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा,-‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे।'

संन्यासियों को शिशुओं में बदल दिया

अनसुइया असमंजस में पड़ गई कि इससे तो उनके पातिव्रत्य धर्म के खंडित होने का संकट है। उन्होंने मन ही मन ऋषि अत्रि का स्मरण किया। दिव्य शक्ति से उन्होंने जाना कि यह तो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। मुस्कुराते हुए माता अनुसूया बोली 'जैसी आपकी इच्छा' इसके बाद तीनों संन्यासियों पर जल छिड़क कर उन्हें तीन शिशुओं में बदल दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व भाव उमड़ पड़ा। शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए।

अनुसुइया माता ने तीनों को झूले में सुलाकर कहा- ‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगीं।

इस प्रसंग पर बहुत ही मनहारी गीत है-

माता अनुसुइया ने डाल दिया पालना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।

मारे खुशी के मैया फूली नहीं समाती है,

गोदी में लेती कभी पालना झुलाती है।

उनके भाग्य की आज को करे सराहना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।

स्वर्ग लोक छोड़ मृत्यु लोक पधारे हो,

ऋषियों की कुटिया में रहने को गुजारे हो।

आज मेरे घर में आये लेने को बड़ाई,

भूल गये भगवान तुम सारी चतुराई।

पतिव्रत देवियों से आज पड़ा सामना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा, एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर उड़ने लगा और एक राजहंस कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। यह दृश्य देखकर नारद, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे।

तीनों देवियां भ्रमित

नारद ने विनयपूर्वक अनुसुइया से कहा- ‘माता अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर देख कर यह तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। यह अपने पतियों को ढूंढ़ रही थीं। कृपया इनके पतियों को इन्हें सौंप दीजिए।'

अनुसुइया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं।' लेकिन जब तीनों देवियों ने तीनों शिशुओं को देखा तो एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं।

नारद ने उनकी स्थिति जानकर उनसे पूछा- ‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लीजिए।' देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया। वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। तीनों देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा याचना की और यह सच भी बताया कि उन्होंने ही परीक्षा लेने के लिए अपने पतियों को बाध्य किया था। फिर प्रार्थना की कि उनके पति को पुन: अपने स्वरूप में ले आएं।

सती अनुसुइया को वरदान

माता अनुसुइया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। तीनों देव सती अनुसुइया से प्रसन्न हो बोले, देवी ! वरदान मांगो। त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए।' तभी से वह मां सती अनुसूया के नाम से प्रख्यात हुई तथा बाद में भगवान दतात्रेय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म माता अनुसूया के गर्भ से हुआ। कुछ लोग ऐसा मत बी प्रस्तुत करते हैं कि ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ।

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