कुबेर का घमंड
पौराणिक कथा
यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।
जब शिव जान गए कुबेर के मन का अहंकार
तीनों लोकों के देवता पहुंचे कुबेर के घर
नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया। तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया तभी गणेश खा गए पूरा खाना दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते। थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी।
फिर गणपति ने कुबेर का बनाया मज़ाक जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था। तभी कुबेर शंकरजी के पास आए और हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए बोले कि मैं अपने कर्म से शर्मिंदा हूं और मैं समझ गया हूं कि मेरा अभिमान आपके आगे कुछ नहीं।
भगवान शंकर ने कुबेर को दिये मुठ्ठीभर चावल
तब
कुबेर का घमंड हुआ चूर
अगर यही कुबेर ने प्यार और विनम्र से सबको भोजन कराया होता तो उसको सबका आशीर्वाद मिलता। इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है कि इंसान की हमेशा ही विनम्र और सादगीपूर्ण स्वभाव रखना चाहिए। फिर चाहे हम कितना ही धन दौलत क्यों न कमा लें।
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