भगवान विष्णु के चार महीने तक सोने का रहस्य

भगवान विष्णु के चार महीने तक सोने का रहस्य

भगवान विष्णु के चार महीने तक सोने का रहस्य

यह तो हम सभी जानते हैं और हमारे धर्म ग्रंथो में भी बताया जाता है कि भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं। वे इंसानी वर्ष के हिसाब से चार महीने तक सोते हैं यह भी हमारे ग्रंथो में वर्णन है।

सनातन धर्म के जानकार और कुछ शोधकर्ता तो भगवान विष्णु की इस निंद्रा को एक वास्तिवकता से जोड़ते हैं। उनके मुताबिक यह समस्त ब्रह्मांड भगवान विष्णु के नींद में देखे जाने वाले सपने की तरह ही है। यह बात वैसे एक तरह से सही भी लगती है पर इसे प्रूफ करना बहुत ही मुश्किल है। भगवान व‌िष्‍णु हर साल आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के ‌द‌िन चार महीने के ल‌िए सो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस समय के दौरान हमें कोई शुभ कार्य नही करना चाहिए। इसीलिए इन दिनों में शादी, जनेऊ, मुंडन, मकान की नींव डालने का काम नहीं क‌िया जाता।

आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। पुराणों में बताया गया है कि देवशयनी एकादशी से लेकर अगले चार महीने के लिए भगवान देवप्रबोधनी तक निद्रा में चले जाते हैं। हिंदू धर्म में देव सो जाने की वजह से कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। अब आपको बताते हैं कि भगवान आखिर क्‍यों 4 महीने तक सोए रहते हैं...

राजा बलि ने जब कर लिया तीनों लोकों पर अधिकार

वामन पुराण में बताया गया है कि असुरों के राजा बलि ने अपने बल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार जमा लिया था। राजा बलि के आधिपत्‍य को देखकर इंद्र देवता घबराकर भगवान विष्‍णु के पास मदद मांगने पहुंचे।

विष्‍णु ने लिया वामनावतार

इंद्र के मदद मांगने के बाद भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने बलि से तीन पग भूमि मांगी। पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं थी तो राजा बलि ने कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रख दें।

भगवान विष्‍णु ने बलि को दिया यह वरदान

भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार में अपने तीन पग रखकर इंद्र देवता की चिंता तो दूर कर दी लेकिन साथ ही वह राजा बलि के दान धर्म से बहुत प्रसन्‍न थे। उन्‍होंने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा तो बलि उनसे पाताल में उनके साथ बसने का वर मांग लिया। बलि की इच्‍छापूति के लिए भगवान को उनके साथ पाताल जाना पड़ा।

माता लक्ष्‍मी ने इस तरह निभाया पति धर्म

भगवान विष्‍णु के पाताल जाने के बाद सभी देवतागण और माता लक्ष्‍मी चिंता में पड़ गए। अपने पति को वापस लाने के लिए माता लक्ष्‍मी ने सूझबूझ के साथ पति धर्म निभाया। व‍ह गरीब स्‍त्री बनकर राजा बलि के पास पहुंची और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और बदले में भगवान विष्‍णु को पाताल लोक से वापस ले जाने का वचन ले लिया।

भगवान विष्‍णु ने बलि का भी रखा मान

भगवान विष्‍णु के पाताल जाने के बाद सभी देवतागण और माता लक्ष्‍मी चिंता में पड़ गए। अपने पति को वापस लाने के लिए माता लक्ष्‍मी ने सूझबूझ के साथ पति धर्म निभाया। व‍ह गरीब स्‍त्री बनकर राजा बलि के पास पहुंची और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और बदले में भगवान विष्‍णु को पाताल लोक से वापस ले जाने का वचन ले लिया। एक तरफ भगवान विष्‍णु के सामने उनकी पत्‍नी लक्ष्‍मी और समस्‍त देवतागण थे और दूसरी तरफ वह बलि को भी निराश नहीं करना चाहते थे। उन्‍होंने राजा बलि को वरदान दिया कि वह आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की एकादशी तक पाताल लोक में वास करेंगे। पाताल लोक में उनके रहने की इस अवधि को योगनिद्रा माना जाता है।

तब शुरू होते हैं शुभ कार्य

उसके बाद कार्तिक मास में देवउठनी एकादशी के बाद भगवान नींद से जागते हैं और फिर सभी शुभ कार्यों का आरंभ होता है।

देवशयनी एकादशी की एक कथा यह भी

पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने लंबे समय तक असुरों के साथ युद्ध किया जिससे वह थक गए थे। इस पर देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु अनंत शयन में चार महीने के लिए चले गए। इस समय देवताओं और ऋषियों ने इनकी पूजा अर्चना की। जिस दिन भगवान सोने गए उस दिन आषाढ़ मास की एकादशी तिथि थी। उस दिन से देवशयनी एकादशी व्रत पूजन की परंपरा शुरू हो गई।

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