धनुर्धर अर्जुन

धनुर्धर अर्जुन

अर्जुन कुंती का सबसे छोटा पुत्र था| इसके पिता का नाम पाण्डु था, लेकिन वास्तविक पिता तो इसका इंद्र था| पाण्डु रोगग्रस्त था और पुत्र पैदा करने की उसमें सामर्थ्य नहीं थी| इसी कारण उसने कुंती को अन्य पुरुषों के साथ रमण करने की आज्ञा दे दी थी, जिससे पुत्रों के द्वारा आगे वंश परंपरा तो चले| उस काल में इस प्रकार के यौन-संबंध किसी प्रकार दूषित नहीं समझते जाते थे, क्योंकि उनके पीछे उद्देश्य पवित्र रहता था| इस प्रकार पांडु की आज्ञा से कुंती को इंद्र से अर्जुन, धर्म से युधिष्ठिर, पवन से भीम और माद्री को अश्विनी कुमारों से नकुल और सहदेव पुत्र रूप में प्राप्त हुए| अर्जुन इंद्र के समान ही प्रतापी और पराक्रमी था| पांडवों में सबसे अधिक युद्ध कुशल और वीर वही था| महाभारत युद्ध में इस पक्ष का सबसे बड़ा महारथी वही था, जिसने कौरवों के परम वीरों से टक्कर ली और अंत में सबको पराजित कर दिया|

इंद्र ने पिता होने के नाते समय-समय पर अर्जुन की सहायता की थी| गुरु द्रोणाचार्य ने इसको धनुर्वेद की शिक्षा दी थी| उस समय पाठशाला में कौरव-पांडव सभी मिलकर अस्त्र-शस्त्र विद्या सीखते थे| अर्जुन उन सबमें तीव्र बुद्धि वाला था| गुरु के बताने पर तत्क्षण ही बात उसकी समझ में बैठ जाती थी और वह उसी समय उसका प्रयोग करके सभी अन्य साथियों को विस्मित कर देता था| कौरवों के विद्वेष का एक कारण यह भी रहा| गुरु द्रोणाचार्य उसको अपने पुत्र अश्वत्थामा से भी अधिक चाहते थे| वह भी सदा गुरु की भक्ति में सन्नद्ध रहता था| इसी गुरु भक्ति के कारण तो वह महाभारत युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व युद्धस्थल पर खड़ा हुआ व्यथित हो उठा था कि गुरु और इस भृत्य समुदाय को मारकर ऐसा कौन-सा सुख है जिसकी मैं कामना करूं, लेकिन कृष्ण के उपदेश ने उसके संशय को मिटा दिया| फिर भी चाहे द्रोणाचार्य कौरव-पक्ष से लड़ रहे थे, अर्जुन की श्रद्धा उनके प्रति कम नहीं हुई थी| जब भी वह गुरु के सामने जाता था, उनको प्रणाम करता था और आशीर्वाद प्राप्त करने की इच्छा करता था|

अश्वत्थामा और अर्जुन में काफी गहरी मित्रता थी| वे दोनों ही गुरु के प्यारे थे और सदा अपना अस्त्र-शस्त्र-कौशल बढ़ाने में लगे रहते थे| एक रात की बात है, गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन पास बैठे भोजन कर रहे थे, उसी समय सहसा दीपक बुझ गया| अंधेरा हो गया और उसमें हाथ से हाथ दिखना असंभव हो गया| उस समय यह देखकर कि अर्जुन के हाथ का कौर सीधे मुंह में ही गया उन्होंने कहा, "वत्स अर्जुन ! अब मुझे विश्वास है कि तू शब्दवेधी बाण चलाना शीघ्र सीख जाएगा|"

उसी समय द्रोणाचार्य ने शब्दवेधी बाण चलाना अर्जुन को सिखाया और वह कुछ ही क्षण में उसकी क्रिया सीख गया| उसी के द्वारा तो उसने अनेक स्थलों पर शत्रुओं के कुचक्रों को व्यर्थ कर दिया था| एक बार गुरु द्रोणचार्य ने इसकी परीक्षा भी ली थी| जब वे अपने शिष्यों के साथ गंगा नहाने गए तो जल में उतरते ही एक मगर ने उनका पैर पकड़ लिया| द्रोणाचार्य ने शिष्यों की परीक्षा लेने हेतु पुकारा, "वत्सो ! मुझे यहां एक ग्राह ने पकड़ लिया है| यह जल के भीतर मुझे खींचे ले जा रहा है, आकर मुझे बचाओ|"

गुरु की पुकार सुनकर सभी छात्र भागकर आए, लेकिन तट पर आकर सभी किंकर्त्तव्यविमूढ़-से होकर एक-दूसरे की ओर ताकने लगे| अकेला अर्जुन ऐसा था, जिसने उसी क्षण धनुष पर बाण चढ़ाकर जल के भीतर मारे और पांचों बाणों से उस ग्राह को मार डाला| इस तरह की तत्काल बुद्धि अर्जुन में ही थी| परिस्थिति के सामने झुकना तो उसने सीखा ही नहीं था| कैसा भी बड़े से बड़ा संकट आने पर वह चुनौती देकर खड़ा हो जाता था और कभी अपने जीवन तक की चिंता नहीं करता था| उसके समान साहसी और बुद्धिमान शायद ही दूसरा कोई था|

जब उसने ग्राह को मारकर गुरु को भीषण संकट से बचा लिया तो गुरु ने प्रसन्न होकर उसे प्रयोग और उपसंहार सहित ब्रह्मशिर अस्त्र चलाना सिखाया|

इसी प्रकार की एक और परीक्षा गुरु द्रोणाचार्य ने ली| परीक्षा के लिए एक दिन निश्चित कर दिया| सभी शिष्य अपने साहस और कौशल का दंभ करते हुए मैदान में आकर खड़े हो गए| लेकिन उन सबमें अर्जुन ही सबसे अधिक कुशल और साहसी प्रमाणित हुआ और गुरु द्रोणाचार्य ने उसकी हृदय से प्रशंसा की, जिसे सुनकर दुर्योधन के हृदय को धक्का लगा| कौरवों में से कोई योद्धा वह काम नहीं कर पाया था, जो अर्जुन ने किए थे| अंत में कर्ण ने आकर वह सारा कार्य कर दिखाया| तब दुर्योधन को कुछ संतोष आया|

कर्ण भी अर्जुन की तरह ही वीर और युद्ध-विद्या में निपुण था| उसको तो गुरु भी परशुराम जैसे मिले थे, जिन्होंने अपने अपूर्व पराक्रम से पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया था| वह कभी भी अर्जुन के कौशल की प्रशंसा नहीं करता था और सदा उसके प्रति एक ईर्ष्या का भाव इसके हृदय में बना रहता था| इसी कारण वह कभी भी पांडव पक्ष में नहीं मिल पाया| उसकी विशेष शत्रुता तो अर्जुन से थी, क्योंकि उसे ही वह अपना प्रतिद्वंद्वी समझता था| सच भी था| अर्जुन के सिवा दोनों पक्षों में और कोई ऐसा योद्धा न था, जो बाण-विद्या में उसको पराजित कर सकता था| अर्जुन ने भी छल से उसको मारा था|

अर्जुन के अपार पराक्रम का परिचय हमें उस समय भी मिलता है, जब उसने कर्मक्षेत्र में गंधर्वराज अंगारपूर्ण का सामना किया था| गंधर्वराज महापराक्रमी था और पहले-पहल उसने अर्जुन को इस तरह ललकारा था जैसे पर्वताकार देह वाला एक योद्धा एक साधारण व्यक्ति को ललकारता है, लेकिन महाबली अर्जुन ने शीघ्र ही अपने पराक्रम का परिचय दे दिया और कुछ ही क्षणों में अपने युद्धकौशल से गंधर्वराज को विचलित कर दिया| यहां तक कि उसने पराजय स्वीकार करके अर्जुन से मित्रता कर ली और उसे चाक्षुषी विद्या सिखा दी, जिसकी प्राप्ति के लिए छ: महीने तक उसको कठोर तपस्या करनी पड़ी थी| गंधर्वराज ने पाण्डवों को गंधर्व जाति से सौ-सौ घोड़े देने का वचन दिया था| उसी की श्रेष्ठ सम्मति मानकर पांडवों ने महर्षि धौम्य को अपना पुरोहित बनाया था|

धनुर्विद्या में अर्जुन ने जो अद्वितीय कौशल प्राप्त कर लिया था, परिचय हमें द्रौपदी स्वयंवर के समय भी मिलता है| राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था| देश-विदेश से महापराक्रमी क्षत्रिय कुमार राजकुमारी का वरण करने की इच्छा से आए हुए थे| उस समय पांडव वनवास का समय काट रहे थे| उन्हें भी जब स्वयंवर का पता चला तो कौतूहलवश वे भी द्रुपद की नगरी में आ पहुंचे| शर्त यह थी कि जो कोई योद्धा स्तंभ के ऊपर घूमती हुई मछली की आंख को, नीचे तेल में उस मछली की परछाईं को देखकर वेध देगा, उसे ही द्रौपदी अपने पति के रूप में स्वीकार कर लेगी| स्वयंवर मण्डप में उपस्थित सभी योद्धाओं ने अपना-अपना कौशल दिखाया, लेकिन कोई भी उस आंख को नहीं वेध पाया| कौरव भी वहां उपस्थित थे| वे भी प्रयत्न करने के पश्चात लज्जित होकर अपने-अपने स्थान पर आ बैठे| जब सभा में चारों ओर निराशा व्याप्त हो गई, तो कर्ण ने उठकर अपना बाण उस मछली की आंख के लिए साधा और वह वीर निश्चित ही उसको वेध देता, लेकिन सूत-पुत्र होने के नाते उसको क्षत्रिय कन्या के साथ विवाह करने का अधिकार नहीं दिया गया| सभा में चारों ओर उसके विरुद्ध स्वर उठने लगे| 

स्वयं द्रौपदी ने ही उसका सूत-पुत्र कहकर तिरस्कार किया था| किसी को भी यह पता नहीं था कि यह कर्ण भी क्षत्रिय पुत्र है, चूंकि सूत ने उसको पाल-पोसकर बड़ा किया था, इसलिए यहीं तक का ज्ञान सबको था| कर्ण अपने मन में घुटकर बैठ गया, तब सबसे अंत में अर्जुन ने अपने धनुष पर बाण साधा और नीचे तेल से भरे कहाड़ में मछली की परछाईं देखकर उसने उसकी आंख वेध दी| बस, चारों ओर बैठे योद्धाओं के हृदय धक से रह गए| द्रौपदी ने आकर उसके गले में वरमाला डाल दी| इस तरह अपने वनवास के समय भी अर्जुन के पराक्रम के कारण पांडवों को द्रौपदी जैसी श्रेष्ठ पत्नी मिली, जो सदा पांडवों के लिए प्रेरक शक्ति बनी रही| कौरवों और कर्ण के हृदय में उस समय भी कील-सी ठुक गई थी| सभी क्षत्रियों ने इसका विरोध किया था और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र उठाकर सभी ने अर्जुन को ललकारा था कि हमारे होते हुए एक भिखमंगा द्रुपद की पुत्री को नहीं ले जा सकता| 

स्थिति काफी भयानक हो गई थी| अर्जुन ने उन योद्धाओं के समूह का अकेले ही सामना किया और सबको परास्त करके उसने यह सिद्ध कर दिया कि वह वनवास के समय भी कोई भिक्षु या याचक नहीं है, बल्कि एक पराक्रमी योद्धा है जो एक बार तो सारे संसार के योद्धाओं को चुनौती दे सकता है| सबको पराजित करके वह अपने भाइयों के साथ द्रौपदी को माता के पास ले गया| वह अपने भाइयों और माता को अपनी जान से भी अधिक चाहता था| स्वार्थ तो उसे छू तक नहीं गया था| यद्यपि द्रौपदी को उसने अपने पराक्रम के बल पर प्राप्त किया था और उसके भोग करने का अधिकार उसी को था, लेकिन माता के यह कहने पर कि जो भिक्षा लाए हो, उसे सभी मिलकर बांट लो, अर्जुन ने द्रौपदी के ऊपर अन्य भाइयों का अधिकार स्वीकार कर लिया| कुंती ने तो बिना यह जाने कि वह द्रौपदी थी, कोई स्थूल वस्तु नहीं, यह बात कही थी ; लेकिन अर्जुन ने अक्षरश: अपनी माता की आज्ञा का पालन किया|

वह कभी भी मर्यादा नहीं तोड़ता था और सदा अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की आज्ञा मानता था| जब द्रौपदी पर सभी का अधिकार हो गया, तो पांचों भाइयों ने मिलकर यह निश्चय किया कि जिस समय द्रौपदी एक भाई के पास रहे, उस समय अन्य चारों भाइयों में से कोई उसके पास न जाए और यदि भूल से कोई चला भी जाए, तो उसे वनवास भोगना पड़ेगा|

एक समय की बात है, युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकांत में थे और जहां वे थे, वहीं अर्जुन का धनुष रखा हुआ था| एक ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए उसको धनुष की आवश्यकता थी ; अत: वह नियम तोड़कर अंदर चला गया और धनुष ले आया| इस तरह उसने ब्राह्मण की रक्षा तो कर ली, लेकिन जो मर्यादा निश्चित की जा चुकी थी, उसको मानकर वह वनवास भोगने चल दिया|

वनवास में तीर्थ यात्रा करते समय मध्य देश में उसको नागकन्या उलूपी प्राप्त हो गई| उसके साथ सहवास करके उसने एक पुत्र उत्पन्न किया था| जिसका नाम बभ्रुवाहन था| यह बालक अभिमन्यु की तरह ही महापराक्रमी था| अपने पिता अर्जन को न पहचानकर जब उसने उसी से युद्ध किया था, तब एक बार तो अपने पराक्रम से अर्जुन को भी मूर्च्छित करके उसे युद्धस्थल पर पटक दिया था|

इसी वनवास काल में ही अर्जुन की श्रीकृष्ण से भेंट हुई| जब वह पश्चिम में प्रभास क्षेत्र में पहुंचे, तो श्रीकृष्ण भी द्वारका से आए थे| कृष्ण ने उसे द्वारका चलने का निमंत्रण दिया तो वे द्वारका आ गए| नियम का पालन करता हुआ अर्जुन नगर के भीतर नहीं घुसा, बल्कि रैवतक पर्वत पर ही ठहर गया| वहीं बलराम तथा यादवगण प्रमुख व्यक्ति उनसे मिलने आए| कुछ दिन तक वह वहीं रहा, इसी बीच में एक उत्सव हुआ जिसमें उसने कृष्ण की बहन सुभद्रा को देखा, उसके रूप और लावण्य को देखकर वह उस पर मोहित हो गया| कृष्ण उसके हृदय के भाव को जान गए और सुभद्रा के लिए योग्य वर समझकर उन्होंने उसे सुभद्रा का हरण करने की सम्मति दी, क्योंकि कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि वैसे बलराम तथा अन्य संबंधी सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ नहीं करेंगे| सखा की बात पर विश्वास करके अर्जुन से सुभद्रा का हरण किया| 

सुभद्रा भी इस योद्धा को देखकर मुग्ध हो गई और पूर्ण संतोष के साथ उसकी पत्नी होकर चली गई| पीछे से बलराम तथा अन्य यादवों को बड़ा क्रोध आया, लेकिन कृष्ण ने सबको समझा दिया| बलराम तो युद्ध के लिए उतारू हो रहे थे, लेकिन कृष्ण के तर्कों के सामने वे भी चुप हो गए और अंत में सभी ने अर्जुन को सुभद्रा के योग्य वर स्वीकार कर लिया और विधिपूर्वक उन दोनों का विवाह करा दिया| उसी सुभद्रा के गर्भ से वीर बालक अभिमन्यु का जन्म हुआ, जिसने चक्रव्यूह में अपने पराक्रम से शत्रुओं को चकित कर दिया और जो अंत में अपने पिता का यश बढ़ाकर वीरगति को प्राप्त हुआ था|

अर्जुन अपने ही सम्मान की चिंता नहीं करता था, दूसरों की मान-मर्यादा की भी चिंता उसे रहती थी| उसने इंद्र के विरुद्ध अग्नि की मान-मर्यादा की रक्षा की थी और उसी से उसे कपिध्वज नाम का दिव्य रथ और गाण्डीव धनुष प्राप्त हुआ| अग्नि ने इंद्र के दंभ को चूर करके खांडव वन को भस्म कर दिया| उसमें से केवल मय नाम का असुर, तक्षक नाग और चार शार्ग्ङक पक्षियों कसे सिवा कोई जीवित नहीं बचा| चूंकि अर्जुन ने मय को प्राणदंड दिया था, इसलिए उसने अपनी कला से पांडवों के लिए एक हजार खंभों का विलक्षण सभा-भवन बना दिया| इसमें उसने कैलास और मैनाक पर्वत से मूल्यवान मणियां लाकर लगाई थीं| देवदत्त नाम का शंख भी मय ने ही अर्जुन को दिया था|

अर्जुन महान विजेता था| उसने अनेक राजाओं को जीतकर इतना धन वसूल किया था की उससे पांडवों ने बड़ी धूमधाम के साथ राजसूय यज्ञ किया| उस यज्ञ में सभी प्रमुख योद्धा और आचार्यगण उपस्थित थे| श्रीकृष्ण को उस यज्ञ में सबसे अधिक सम्मानीय महापुरुष माना गया था|

राजसूय यज्ञ का यह समय पांडवों के ऐश्वर्य और समृद्धि का समय था, लेकिन बाद में युधिष्ठिर के जुए में हारने के पश्चात इनके जीवन का संकट-काल उपस्थित हो गया| अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता का इतना सम्मान करते थे कि अपना सबकुछ हार जाने के पश्चात जब युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और पत्नी को दांव पर लगा दिया, तब भी अर्जुन ने इसका विरोध नहीं किया| यहां तक कि दु:शासन ने जब भरी सभा में द्रौपदी को नंगा करने का साहस किया, उस समय भीमसेन भी विचलित हो उठा था| लेकिन अर्जुन अपने अग्रज की ओर देखकर चुपचाप बैठा था| वह धीर और बुद्धि था, कभी उतावला होकर कोई कार्य नहीं करता था| उस समय युधिष्ठिर के वचन का सम्मान करके वह चुप रहा था, लेकिन मौका आने पर एक-एक महारथी से द्रौपदी के अपमान का बदला लिया|

वह दूरदर्शी भी था| आगे क्या करना है उसके लिए पहले से ही योजना बनाना वह प्रारंभ कर देता था| वनवास के समय में उसे यह आशंका हो गई थी कि कौरवों का हृदय मैला है| वे वनवास के पश्चात भी राज्य का थोड़ा भी हिस्सा नहीं देंगे| युद्ध के द्वारा ही उनसे अपना अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, यह दृढ़ संकल्प लेकर उसने अपनी सामर्थ्य बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया| धर्मराज से उसने वह जगत प्रकाशक विद्या सीखी, जो उन्होंने व्यास से प्राप्त की थी| इसके पश्चात दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति के लिए वह तपस्या करने चल दिया| हिमालय और गंधमादन पर्वत को लांघकर वह कैलास पर्वत पर आया| वहां एक वराह के ऊपर उसका एक किरात से झगड़ा हो गया|

दोनों मरे हुए वराह को अपना बतलाते थे| अंत में युद्ध हुआ| किरात ने अपनी कला से अर्जुन का सारा पराक्रम हर लिया| इस तरह अपने को निर्बल पाकर अर्जुन को आश्चर्य होने लगा और फिर एक क्षण में ही किरात की अलौकिक शक्ति का अनुमान लगाकर उसने उसको प्रणाम किया और उसे प्रसन्न करके उससे पाशुपात अस्त्र प्राप्त किया| वह किरात और कोई नहीं, स्वयं वेश बदले हुए भगवान शिव थे| इस प्रकार उन्होंने अर्जुन के बल की परीक्षा ली थी|

इससे यह पूरी तरह स्पष्ट होता है कि अर्जुन परिस्थिति को ठीक तरह पहचानकर उससे लाभ उठाने वाला बुद्धिमान योद्धा था| वह ऐसा मुर्ख क्षत्रिय नहीं था, जो अपने पराक्रम का सही अनुमान न लगाकर व्यर्थ का दंभ भरा करते हैं|

पाशुपात अस्त्र प्राप्त करके वह आगे बढ़ा तो उसे इंद्र का सारथी मातलि रथ लिए हुए मिला|गंगा में स्नान करके वह रथ पर बैठ गया और अमरावती पहुंच गया| वहां इंद्र ने उसका बड़ा स्वागत किया और अपने साथ ही आसन पर बिठा लिया| यहां उसने पांच वर्षों तक अनेक दिव्यास्त्रों की संचालन-क्रिया सीखी| उसी समय चित्रसेन गंधर्व उसका मित्र हो गया, जिसे उसने नाचना-गाना आदि सिखाया, जो मत्स्य-नरेश विराट के यहां काम आया|

देव सभा में उर्वशी नाम की महासुंदरी अप्सरा आया करती थी, जिसको अर्जुन वंश-माता के रूप में देखा करता था| उसके हृदय के भाव को न जानकर चित्रसेन ने समझा कि वह उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया है| इसीलिए उसने एक दिन उर्वशी को उनके पास भेज दिया| उर्वशी अपना कामुक रूप लेकर उनके पास पहुंची और सहवास के लिए इच्छा प्रकट करने लगी| अर्जुन के तेजस्वी रूप को देखकर वह काम से पीड़ित हो रही थी| उसने अर्जुन को अपने साथ रमण करने की इच्छा जताई|

यह सुनकर अर्जुन ने चौंककर कहा, "उर्वशी ! आप तो हमारी वंश-माता हैं, फिर मैं ऐसा पाप-कार्य कैसे कर सकता हूं? आपकी यह धारणा मेरे विषय में गलत है कि मैं आपके प्रति कामासक्त हूं| मैं तो आपको पूज्या मानकर आपका सम्मान करता हूं|"

अर्जुन की इस बात को सुनकर भी उर्वशी की काम पीड़ा उतनी ही बनी रही और उसने कहा, "छोड़ो, इस धारणा को वीरवर ! आओ मेरी काम-पीड़ा को शांत करो|"

जब उर्वशी के कई बार कहने पर भी अर्जुन तैयार नहीं हुआ तो उसने क्रुद्ध होकर उसे नपुंसक हो जाने का शाप दिया| उसके लिए निश्चित अवधि थी| आगे चलकर यह शाप ही अर्जुन का सहायक बना और अज्ञातवास के समय इसी के कारण विराट के यहां उनका रहना संभव हुआ| बृहन्नला बनकर वह उत्तरा को नाचना-गाना सिखाता रहा और इस तरह अपना वह सारा समय काटता रहा|

इंद्र से अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त करके अर्जुन बदरी वन में नर-नारायण के आश्रम में पहुंचा| अन्य पांडव भी वहीं प्रतीक्षा कर रहे थे| आकर उसने अपने भाइयों को अपनी यात्रा का सारा विवरण सुनाया और जो दिव्यास्त्र प्राप्त किए थे उनका परिचय दिया|

अर्जुन स्वार्थी और संकुचित मनोवृत्ति का मनुष्य नहीं था| उसका हृदय उदार और क्षमाशील था| यद्यपि कौरवों ने उसका और उसके भाइयों का अनिष्ट कर दिया था और उसकी पत्नी का अपमान किया था, लेकिन भाई के नाते फिर भी अर्जुन ने एक बार गंधर्वराज चित्रसेन से युद्ध करके दुर्योधन आदि को छुड़ाया| चित्रसेन उसका मित्र था, लेकिन एक बार उसने भाइयों के पीछे इस मित्रता की भी चिंता नहीं की| दुर्योधन फिर भी कठोर और ईर्ष्यालु बना रहा, लेकिन अर्जुन को इसका विशेष खेद नहीं हुआ, क्योंकि वह तो कर्तव्य की श्रेष्ठता में विश्वास करने वाला व्यक्ति था| कर्तव्य से प्रेरित होकर कठिन से कठिन कार्य करने की क्षमता उसमें थी|

इसी प्रकार कर्तव्यपरायणता का परिचय उसने उस समय दिया था, जब वह अज्ञातवास के समय राजा विराट के यहां ठहरा हुआ था और कौरवों ने विराट के ऊपर आक्रमण कर दिया था| झूठा दंभ भरने वाला उत्तर उस समय अर्जुन को सारथी बनाकर युद्ध के लिए ले गया था, लेकिन वह कौरवों की सैन्य शक्ति देखकर डरकर भागने लगा| तब अर्जुन ने उसे रोककर कौरवों का स्वयं सामना किया और उन्हें परास्त किया| राजा विराट के प्रति अपने कर्तव्य का वह इसी तरह पालन कर सकता था| इसीलिए अपने भाइयों का भी उसने सामना किया| इससे स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन को किसी व्यक्ति विशेष से लगाव नहीं था, बल्कि कर्तव्य, न्याय और सत्य की भावना ही उसके जीवन के लिए प्रेरक शक्तियां थीं| फिर अभिमान तो उसको छू तक नहीं गया था| बड़े से बड़ा कार्य करके वह भी वह अपने पराक्रम की डींग नहीं मारता था| दूसरों को प्रशंसा करते हुए सुनकर भी वह कुछ नहीं बोलता था|

अर्जुन नम्र और विनयशील भी था| वह श्रीकृष्ण के पूछे बिना कोई कार्य नहीं करता था और उन्हें अपना सच्चा सखा मानता था| कृष्ण ही उसकी विजय के आधार थे| यदि उसे ऐसा सारथी नहीं मिलता, तो शायद वह कौरवों की उस विशाल सेना को नहीं जीत पाता, जिसमें भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथी युद्ध कर रहे थे| कृष्ण की नीति-निपुणता से ही उसने भीष्म पितामह को धराशायी किया| उन्हीं की चाल से गुरु द्रोणाचार्य को उसने पराजित किया और उन्हीं की सूझ के बल पर कर्ण जैसे योद्धा को मार गिराया| इन तीन पराक्रमी सेनापतियों से टक्कर लेना मामूली काम नहीं था, लेकिन अर्जुन से अपनी सामर्थ्य और शक्ति के बल पर इनका सामना किया और इन सबको धराशायी करके विजय का शंख बजाया|

कृष्ण ने अनेक बार उसके जीवन की भी रक्षा की थी| पहले-पहल तो भीष्म जैसे पराक्रमी से ही उसका बचना कठिन था, फिर कर्ण तो उसे जीवित कभी नहीं छोड़ता| जब उसने सर्प के विष में बुझा बाण उसकी ओर लक्ष्य करके मारा था और यह घोषणा की थी कि अर्जुन मारा गया, तब श्रीकृष्ण ने ही घोड़ों को बिठाकर रथ को नीचा किया था जिससे वह भयानक बाण अर्जुन का मुकुट काटकर ही निकल गया था, नहीं तो उस दिन उसके जीवन का अंत था| इस तरह अनेक स्थलों पर हम अर्जुन के जीवन में कृष्ण की महत्ता पाते हैं|

कृष्ण के उपदेशों के फलस्वरूप ही वह निष्काम कर्मयोगी हो गया था| कर्तव्य के आगे सुख और दुख एक जैसे ही उसको दिखाई पड़ते थे| इसी उपदेश की शक्ति से वह पूरे महाभारत युद्ध में कभी विचलित  नहीं हुआ| हम पहले ही देख चुके हैं कि स्वार्थ तो उसके हृदय पर कभी अधिकार नहीं जमा सका था| इंद्र ने उससे इंद्रपुरी में रहकर ऐश्वर्य भोगने के लिए कहा था, लेकिन अपने सुख के लिए उसने भाइयों का तिरस्कार नहीं किया| वास्तव में वह पूरा साधक था| एक बार जिसकी भी दृढ़ कल्पना अपने हृदय में कर लेता था, फिर कोई भी शक्ति उसे उस मार्ग से हटा नहीं पाती थी| इसी प्रकार उर्वशी के ऊपर कामासक्त न होकर उसने अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य का परिचय दिया था| एक तरह से देखा जाए, तो वह जितेंद्रिय था| उसको अपने मन पर अधिकार था और जब कभी किसी प्रकार का संशय उठता भी था, तो कृष्ण उसको दूर करने के लिए उसके पास रहते थे|

उसके किसी के साथ प्रणय-संबंध जोड़ने में भी एक प्रकार गौरव रहता था| छिपकर प्रेम करना तो उसे आता ही नहीं था| वह तो पहले अपने पराक्रम का परिचय देता था और अपने आपको पूरी तरह समर्थ प्रमाणित करके किसी सुंदरी से प्रेम करता था| उसके प्रेम में वीरों की सच्चाई थी| राजपरिवार का व्यक्ति होते हुए भी वह कूटनीति नहीं जानता था| वह तो सीधा-सच्चा योद्धा था| पर्वत से टकराने की समार्थ्य रखता था, लेकिन साम, दाम, दण्ड, भेदपूर्ण नीति में निपुण नहीं था| इसके लिए तो कृष्ण ही सदा उसको मार्ग दिखाया करते थे| वह तो इतना सीधा था कि स्वयं अपने समर्थक धृष्टद्युम्न से ही इस आधार पर उलझ पड़ता था कि उसने द्रोणाचार्य को मारा था| 

यद्यपि द्रोणाचार्य के वध के पीछे सारी चाल तो कृष्ण की थी| धृष्टद्युम्न ने तो उस चाल के बाद द्रोणाचार्य को केवल मार डाला था, और फिर द्रोणाचार्य का मरना पांडवों के हित में ही था; लेकिन अर्जुन के हृदय में गुरु भक्ति उमड़ पड़ी और उस समय अपना हित-अहित उसे कुछ भी नहीं सूझा| इससे स्पष्ट होता है कि वह सरल हृदय योद्धा था| उसके लिए सदा एक निर्देशक की आवश्यकता रहती थी और वह निर्देशक कृष्ण थे| यदि वे न होते तो गीता का उपदेश सुनने के पश्चात भी हो सकता था अर्जुन स्वजनों की मृत्यु देखकर विचलित होकर युद्धभूमि से चला जाता, लेकिन कृष्ण ने सदा उसको उचित मार्ग पर लगाए रखा| इस तरह भावुकता अर्जुन ने चरित्र में एक शिथिलता के रूप में थी, लेकिन सरल हृदय व्यक्तियों में वह स्वाभाविक ही है|

यदि अर्जुन और अन्य पांडव इतने सरल हृदय वाले नहीं तो दुष्ट दुर्योधन उनको इतने कष्ट न दे पाता| वे तो सदा सत्य, न्याय और मर्यादा की रक्षा करना ही अपने जीवन का चरम उद्देश्य समझते थे और राजनीति में इन्हीं वस्तुओं की विशेष आवश्यकता नहीं होती| उसे तो आवश्यकता पड़ने पर कुटिलता का भी आश्रय लेना पड़ता है| महाभारत में राजा के धर्म के विषय में विस्तृत विवेचन है| उसमें राजा की नीति का वर्णन किया गया है और बताया गया है कि भेद-नीति से राजा को अपने शत्रुओं का दमन करना चाहिए| सरलता और सच्चाई का आश्रय लेने से शत्रु कभी वश में नहीं आ सकता| यही पांडवों की कमजोरी थी, लेकिन कृष्ण जैसे कूटनीतिज्ञ उनके साथ थे, इसीलिए अंत में विजय उनकी हुई|

इस सरलता का एक उदाहरण यही है कि अर्जुन के पुत्र का वध कौरवों ने कर दिया था और उस पर दुखी होकर उसने जयद्रथ को मारा था, लेकिन अगर वह चाहता तो अपने दिव्य अस्त्रों के बल से सभी शत्रुओं का विनाश कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया| दूसरी तरफ अश्वत्थामा को देखो कि कितने दिनों तक उसके हृदय में प्रतिशोध पलता रहा और अंत में उसने द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या करके ही चैन लिया| यहां तक कि पांडवों को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी किया था| ऐसा निर्दयतापूर्ण कार्य अर्जुन कभी नहीं कर सकता था| उसने अपनी प्रतिशोध की आग को शांत करने के लिए निहत्थे बालकों पर कभी हाथ नहीं उठाया| वह तो योद्धाओं को ललकारना जानता था और उन्हीं को पराजित करने में सच्चा गौरव मानता था| इस तरह कहीं भी देखें, अर्जुन ने कूटनीति का कभी आश्रय नहीं लिया|

इसके अलावा क्षमा भी उसके स्वभाव का विशेष गुण था| यह गुण तो युधिष्ठिर में विशेष रूप से था| अपने पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को भी उस महान युधिष्ठिर ने क्षमा कर दिया| कौरव-पक्ष में किसी योद्धा के अंदर यह गुण नहीं था| युधिष्ठिर के संस्कार अर्जुन पर भी पड़े थे| वह भी क्षमाशील था| इसके साथ ही वह विवेकपूर्ण भी था| अपनी भूल पर पश्चाताप करने का साहस उसमें था| एक बार युधिष्ठिर के लिए अर्जुन के मुंह से कुछ कटु वचन निकल गए थे, लेकिन फिर संयत अवस्था में आने पर उसने अपनी भूल पर पश्चाताप किया और अग्रज से क्षमा मांगी|

अग्रज की आज्ञा पालन करना ही उसके जीवन का सुख था| असंतोष तो कभी उसने अनुभव ही नहीं किया और न कभी यह कामना की कि मुझे अपने भाइयों से अधिक मान-प्रतिष्ठा मिले| दुरभिमान उसे छू तक नहीं गया था| देखा जाए तो उसी के बल पर पाण्डवों ने हर जगह विजय प्राप्त की थी, लेकिन कभी भी उस वीर ने यह आकांक्षा नहीं की कि कोई अलग राज्य स्थापित कर ले या कभी अपने पराक्रम की डींग मारने लगे| उसके चरित्र में एक महापुरुष की-सी गरिमा था, जो जीवन के लघु स्वार्थों से उठकर विराट सत्यों का साक्षात्कार कर लेता है| वैसे अर्जुन वेद-वेदांग पढ़ा हुआ था|

कभी-कभी लोग कर्ण का अन्यायपूर्ण वध करने के बारे में अर्जुन को दोषी ठहराते हैं, लेकिन स्पष्ट बात यह है कि यह सारा इशारा तो श्रीकृष्ण का था| यदि कृष्ण आदेश नहीं देते तो अर्जुन कभी कर्ण को रथ का पहिया निकालते समय नहीं मारता| चाहे वह परास्त हो जाता, लेकिन कर्ण के सामने आकर युद्ध करता| कृष्ण ने परिस्थिति को देखकर ठीक ही किया था| इसके अलावा कर्ण को मारना और किस तरह से संभव नहीं था| फिर विधाता की गति भी कुछ ऐसी ही थी| कर्ण को परशुराम का यह शाप भी था कि अर्जुन से युद्ध करते समय वह शस्त्र प्रयोग करना भूल जाएगा| इसलिए अर्जुन को इस संबंध में किसी प्रकार दोषी ठहराना उचित नहीं है| इसी प्रकार भीष्म पितामह की भी हत्या अन्याय से अर्जुन ने नहीं की थी, स्वयं भीष्म ने ही अपनी मृत्यु का उपाय उसे बता दिया था, फिर उसके लिए किसी प्रकार के छल के लिए स्थान ही नहीं था|

उक्त विवरण से हमें यही पता चलता है कि अर्जुन एक अजेय योद्धा था, लेकिन कृष्ण ही उसके एक ऐसे साथी थे जिनकी सहायता से उसके सभी कार्य पूर्ण हो जाते थे| जब कृष्ण इस संसार को छोड़कर चले गए, तो अर्जुन ने देखा कि उस गाण्डीव धनुष द्वारा अर्जुन कृष्ण की स्त्रियों की आभीरों से रक्षा नहीं कर सका| वे लोग उन स्त्रियों को लूटकर ले गए और अर्जुन गाण्डीव की प्रत्यंचा नहीं खींच सका| वह वृद्ध और दुर्बल हो गया था| उस समय उसका यह अहंकार भी टूट गया था कि वह एक अदम्य और अजेय योद्धा है| वह उसी निर्जन वन में अपने साथी और गुरु कृष्ण की याद में विलाप करने लगा था| महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात सभी पांडव हिमालय की ओर चले गए और वहीं गलकर इस संसार से सदा के लिए उठ गए| इस तरह महाभारत के इस परम योद्धा की जीवन-यात्रा समाप्त हुई !

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