वनवास के दौरान द्रौपदी के पास महर्षि दुर्वासा के आने की कहानी
पांडवों के वनवास के दौरान आए दिन कोई न कोई ब्राह्मण उनके यहां भोजन करने आया ही करते थे।
वन में निवास कर रहे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन की कोई कमी न हो, इसके लिए युधिष्ठिर ने तपस्या करके भगवान सूर्य से अक्षय पात्र प्राप्त किया था।
इसकी यह विशेषता थी कि इसमें पकाया हुआ अन्न तब तक समाप्त नहीं होता था जब तक स्वयं द्रौपदी भोजन न कर ले। ऐसे चमत्कारों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। जहां चावल के एक दाने ने 10 से भी अधिक लोगों का पेट भर दिया था। यह किस्सा है द्वापर युग का। जहां पांडवों के साथ यह वृतांत हुआ था। आइए जानते हैं
पांडवों से है नाता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा दुर्योधन के महल पहुंचे। जहां उनकी खूब आवभगत हुई। इसके बाद दुर्योधन ने उन्हें पांडवों से मिलकर उन्हें भी आतिथ्य सेवा करने का मौका देने की बात कही। दुर्योधन ने पांडवों को दुर्वासा ऋषि द्वारा शापित करने का षड़यंत्र रचा। उसने अपने यहां पधारे हुए दुर्वासा ऋषि की खूब सेवा की।
जब उन्होंने दुर्योधन से प्रसन्न होकर उसे कुछ मांगने को कहा, तब उसने उनसे युधिष्ठिर के यहां पधारने को कहा। उसने उनको यह भी कहा कि वह पांडवों की कुटिया में तब पधारें जब द्रौपदी अन्य ब्राह्मणों को खिलाकर ख़ुद खा चुकी हो। ऋषि दुर्वासा भी इस बात को मानकर अपने 10 से अधिक शिष्यों के साथ पांडवों के घर जाने को प्रस्थान किया।
महर्षि दुर्वासा और युधिष्ठिर संवाद
आगे कथा मिलती है कि जब महर्षि दुर्वासा पांडवों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि वह आज उनके यहां निवास करेंगे और भोजन ग्रहण करेंगे। इसके बाद युधिष्ठिर ने उन्हें स्नान-आदि से निवृत्त होने का आग्रह किया।
द्रौपदी की चिंता
युधिष्ठिर ने जब यह बात द्रौपदी को बताई तो उनकी चिंता बढ़ गई। परेशानी का कारण यह था कि सभी भोजन कर चुके थे और भोजन भी शेष नहीं था। ऐसे में यदि महर्षि दुर्वासा को भोजन न करा पाए तब तो वह शाप दे देंगे।जब दुर्वासा ऋषि अपने अन्य शिष्यों के साथ पांडवों की कुटिया में पहुंचे, तब युधिष्ठिर ने उनका स्वागत सत्कार किया। उन्होंने अपने मेहमानों को भोजन का निमंत्रण भी दे दिया।
दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्य भोजन से पहले पास के तालाब में स्नान करने गए। तभी द्रौपदी ने अन्न की व्यवस्था न होने के भय से भगवान् श्री कृष्ण का स्मरण किया।
अक्षयपात्र में एक दाना चावल का
कहा जाता है कि द्रौपदी को सूर्यदेव से एक अक्षयपात्र मिला था। जिसमें तब तक अन्न रहता था जब तक की द्रौपदी भोजन न कर लें। जैसे ही सबको खिलाने के बाद वह भोजन ग्रहण करतीं, वह पात्र पूरी तरह से खाली हो जाता था। महर्षि जब पधारे तब सभी पांडव और पांचाली भोजन कर चुकी थीं।
माधव-द्रौपदी संवाद
श्री कृष्ण उसकी प्रार्थना को सुन तुरंत उसके पास प्रकट हो गए। कृष्ण जैसे ही द्रौपदी के पास पहुंचे उन्होंने कहा कि अत्यंत भूखा हूं, जल्दी से कुछ खाने को दो। इसपर द्रौपदी ने कहा कि मोहन इसीलिए तो तुम्हें पुकारा है। इसके बाद पूरी बात कह सुनाई। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि देखो तो पात्र में शायद कुछ शेष रह गया हो।
एक दाने से भर गया पेट
कृष्ण के बार-बार भोजन का आग्रह करने पर द्रौपदी ने उनके सामने वह अक्षयपात्र लाकर रख दिया। उन्होंने द्रौपदी से खाने के लिए कुछ मांगा। किन्तु द्रौपदी ने श्री कृष्ण से कहा कि उसके पास भोजन समाप्त हो चुका है, इसलिए उसने भगवान् का स्मरण किया था। लेकिन कृष्ण ने द्रौपदी को वो पात्र लाने को कहा। जब उसने वह खाली पात्र श्री कृष्ण को दिखाया, देवकीनंदन ने देखा कि उस पात्र में चावल का एक दाना शेष रह गया था। उन्होंने जैसे ही उसे खाया उधर स्नान करके भोजन के लिए आ रहे महर्षि दुर्वासा और उनके शिष्यों का पेट भर गया।
यूं ही प्रस्थान कर गए महर्षि
महर्षि दुर्वासा और उनके शिष्यों को जैसे ही यह अहसास हुआ कि उनका पेट तो काफी भरा हुआ है। वह तो अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं कर सकते। तब उन्होंने आपस में पांडवों को बिना बताए ही प्रस्थान करने का निर्णय लिया। चूंकि महर्षि दुर्वासा जानते थे कि युधिष्ठिर धर्म प्रिय हैं वह अतिथि को बिना भोजन कराए जाने नहीं देंगे, ऐसे में वह पांडवों को बगैर बताए हुए अपने शिष्यों के साथ वहां से प्रस्थान कर गए। इस तरह भगवान् श्री कृष्ण ने एक और बार पांडवों के मान की रक्षा की थी।
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