दशरथ के कुल का नाम इक्ष्वाकु वंश था राजा दशरथ के पिता राजा अज और उनके पिता राजा रघु थे। रघु के नाम पर ही रघुकुल कहा जाता है यानी राजा दशरथ रघुकुल के थे। जो वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक थे। भगवान राम का जन्म सूर्यवंशम या सौर वंश के इक्ष्वाकु वंश की 81वीं पीढ़ी में हुआ था । यह वंश 1634 ईसा पूर्व तक 64 पीढ़ियों तक जारी रहा, जहां अंतिम राजा सुमित्रा को चाणक्य के समकालीन महापद्म नंद ने मार डाला था।
कैकेयी चाहती थीं कि उनके पुत्र भरत को अयोध्या के राजा के रूप में ताज पहनाया जाए। वह दशरथ के ज्येष्ठ राम के प्रति समस्त अयोध्या की भावनाओं को जानती थी।
राम नाम के विष्णु अवतार को अन्य नामों से भी जाना जाता है। उन्हें रामचंद्र (सुंदर, प्यारा चंद्रमा), या दशरथी (दशरथ का पुत्र), या राघव (हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में रघु के वंशज, सौर वंश) कहा जाता है।
हिन्दू धर्म के अनुसार काल या आश्रम गर्भाश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम बताये गये हैं
ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारी): यह आश्रम जीवन के पहले चरण का है, जिसमें छात्र या ब्रह्मचारी गुरुकुल में गुरु के निर्देशन में अध्ययन करता है और विद्या प्राप्त करता है। इस आश्रम का मुख्य उद्देश्य ब्रह्मचर्य और विद्या अर्जन है।
गृहस्थ (गृहस्थी): यह आश्रम संसार में परिवार का जीवन जीने वालों के लिए है। इस आश्रम में विवाह के बाद पुत्रवधू सहित पुत्रों की उत्पत्ति और पालन-पोषण, समाजिक कर्तव्यों का निर्वहन आदि शामिल होते हैं।
वानप्रस्थ (वानप्रस्थी): यह आश्रम जीवन के तीसरे चरण का है, जब व्यक्ति संसार से विरक्त होकर अपने परिवार और सामाजिक कर्तव्यों को छोड़कर आध्यात्मिक आत्मसात की ओर अधिगम करता है।
संन्यास (संन्यासी): यह आश्रम जीवन के चौथे चरण का है, जिसमें व्यक्ति संसार से पूरी तरह से विरक्त होकर संयम और साधना के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति के लिए पूरी तरह समर्पित होता है।