भगवान गणेश को एकदंत या एक दांत वाले के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि उनका एक दांत टूटा हुआ है।
जब ऋषि अगस्त्य ने दक्षिण में ध्यान करने के लिए अपना बर्तन जमीन पर रखा, तो एक कौवे के रूप में गणेश आए और बर्तन को नीचे गिरा दिया। मटके से पानी बह निकला और वह कावेरी नदी में बदल गया।
अनुसार एक प्रमुख कथा के अनुसार, भगवान गणेश के प्रेमी और भक्त थे जिन्होंने अपनी माता पार्वती के साथ एक दिन व्रत करने का निर्णय लिया। इस व्रत के दिन गणेश जी ने बिना किसी अंतर्यामी को खाने का भ्रम न किया और उनकी पूजा एवं व्रत ने उन्हें अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने का आशीर्वाद प्रदान किया। इससे यह पर्व सकट चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है और भक्तों को गणेश जी की कृपा का अनुभव करने का अवसर मिलता है। इस प्रकार, सकट चतुर्थी भगवान गणेश के प्रति भक्ति और श्रद्धा का एक उत्कृष्ट रूप है, जो उनकी पूजा और आराधना के माध्यम से भक्तों को सुख, समृद्धि, और आनंद का अहसास कराता है।