हिन्दू धर्म के अनुसार काल या आश्रम गर्भाश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम बताये गये हैं
ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारी): यह आश्रम जीवन के पहले चरण का है, जिसमें छात्र या ब्रह्मचारी गुरुकुल में गुरु के निर्देशन में अध्ययन करता है और विद्या प्राप्त करता है। इस आश्रम का मुख्य उद्देश्य ब्रह्मचर्य और विद्या अर्जन है।
गृहस्थ (गृहस्थी): यह आश्रम संसार में परिवार का जीवन जीने वालों के लिए है। इस आश्रम में विवाह के बाद पुत्रवधू सहित पुत्रों की उत्पत्ति और पालन-पोषण, समाजिक कर्तव्यों का निर्वहन आदि शामिल होते हैं।
वानप्रस्थ (वानप्रस्थी): यह आश्रम जीवन के तीसरे चरण का है, जब व्यक्ति संसार से विरक्त होकर अपने परिवार और सामाजिक कर्तव्यों को छोड़कर आध्यात्मिक आत्मसात की ओर अधिगम करता है।
संन्यास (संन्यासी): यह आश्रम जीवन के चौथे चरण का है, जिसमें व्यक्ति संसार से पूरी तरह से विरक्त होकर संयम और साधना के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति के लिए पूरी तरह समर्पित होता है।
मंदोदरी मधुरा नामक एक अप्सरा थी, जिसे देवी पार्वती ने 12 साल तक एक कुएं में मेंढकी बनने का श्राप दिया था, जब उसे पता चला कि मधुरा जब भगवान शिव से दूर थी तो वह उनके साथ गुप्त रूप से सहवास करने की कोशिश कर रही थी।
रावण के चार भाई थे जो एक ही माता की संतान थे वे हैं कुम्भकर्ण ,अहिरावण, महिरावण और विभीषण । इनमें से अहिरावण तथा महिरावण जुड़वाँ भाई थे ।
किंवदंती है कि मंदोदरी अपने पिछले जन्म में मधुरा नाम की एक दिव्य कन्या थी। उन्होंने देवी पार्वती के श्राप के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर एक महिला के रूप में जन्म लिया जिसके कारण वह एक मेंढक बन गईं।
रावण, रामायण के कथा में एक प्रमुख चरित्र हैं। उनका पूरा नाम दशानन था। वे लंका के राजा थे। रावण को विश्रवा और केकसी के पुत्र के रूप में जाना जाता है। रावण को दस शीर्ष योद्धाओं में से एक माना जाता है, जिनमें उनकी अद्वितीय शक्ति और विजय प्राप्ति का उल्लेख किया गया है। रामायण के कथा में, रावण भगवान राम के प्रमुख विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, और रामायण में उनकी लंका पर प्रतिरोध करने की कहानी व्याप्त है। भगवान राम ने रावण के प्रति अधर्म के प्रतिष्ठान के लिए उन्हें विजय प्राप्ति के लिए लंका का विनाश किया।