षटतिला एकादशी का मनाना हिन्दू धर्म में विशेष महत्वपूर्ण है और इसे विशेष रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों से मनाया जाता है। इसे कैसे मनाया जाता है और इसके पीछे कुछ कारणों को नीचे देखा जा सकता है षटतिला एकादशी के दिन व्रती भक्त उपवास करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। यह पूजा विशेष रूप से माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अर्पित होती है। षटतिला एकादशी के दिन भगवान के भजन गाए जाते हैं और भक्तजन विशेष रूप से रात्रि भर जागरण करते हैं। इस दिन भक्तजन दान और अन्नदान करते हैं। गरीबों और आवश्यकता मंद व्यक्तियों को भोजन, वस्त्र, और आवश्यक सामग्री देना इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।: कई स्थानों पर षटतिला एकादशी के दिन सत्यनारायण कथा का पाठ किया जाता है। यह कथा विशेष रूप से व्रत के दिनों में भगवान सत्यनारायण की पूजा में प्रयुक्त होती है। कुछ लोग षटतिला एकादशी के दिन भगवद गीता का पाठ करते हैं और इसे सुनते हैं। गीता का पाठ भक्ति और ज्ञान की वृद्धि के लिए किया जाता है। षटतिला एकादशी के दिन की रात को व्रती द्वादशी तिथि के आगमन पर उपवास खत्म करते हैं और फलाहार या सात्विक आहार से अपना उपवास तोड़ते हैं।
इस वर्ष धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:47 बजे से शाम 7:43 बजे तक रहेगा और लगभग 2 घंटे तक रहेगा। देवी लक्ष्मी, गणेश, धन्वंतरि और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है और भगवान को फूल, माला और लापसी या आटे का हलवा, गुड़ के साथ धनिया के बीज या बूंदी के लड्डू का प्रसाद चढ़ाया जा सकता है।
शेषनाग या आदिशेष के माता-पिता के नाम जाह्नवी (जल और जीवन का स्मारक) और कश्यप (ऋषि कश्यप) थे। वे भगवान विष्णु के शायनकक्ष (शयनकक्ष) पर शेषशायी रूप में अपने पर्णित चादर में शयन करते हैं। इसके अलावा, आदिशेष को जल नाग भी कहा जाता है, क्योंकि उन्हें जल तत्व का प्रतीक माना जाता है। कश्यप एक प्रमुख ऋषि और पितामह (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, गरुड़, नाग, राक्षस, दैत्य, दानव, मनुष्य, पक्षी, पशु, और पर्वतों के पिता) के एक स्वयंभू संतान थे। कद्रू एक दैत्य राजकुमारी थी और वह नागों की माता थी। इसके अलावा, कद्रू की एक बहन भी थी जिनका नाम विनता था, जो भीष्म पितामह के माता थीं।