व्रत के दिन कोई भी अच्छा नहीं होता, और कभी-कभी व्रती को कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। इस समय धैर्य, शांति, और भगवान की शरण में रहना अच्छा होता है। उपवास को उद्यापन करते समय व्रती को सात्विक आहार से ही उपवास खत्म करना चाहिए। षटतिला एकादशी के दिन दान और सेवा का विशेष महत्व है। गरीबों को भोजन, वस्त्र, और आवश्यक सामग्री प्रदान करना व्रत की पूर्ति में सहायक होता है। षटतिला एकादशी के दिन भगवद गीता का पाठ, सत्यनारायण कथा का पाठ, और भगवान विष्णु की अन्य स्तुतियां भी की जा सकती हैं। यह सभी धार्मिक क्रियाएं विभिन्न परंपराओं में की जाती हैं और भक्तों को ध्यान में रखने में मदद करती हैं। षटतिला एकादशी के दिन किसी भी प्रकार की हिंसा से बचना चाहिए। व्रती को शांति, प्रेम, और समर्थन का भाव बनाए रखना चाहिए।उपास्या के समय भक्ति और आदर्श भावना के साथ रहना चाहिए। भगवान की पूजा में मन, वचन, और क्रिया से युक्त रहना आवश्यक है।
प्रह्लाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था, जिसने भगवान विष्णु को मारने की कसम खाई थी। हिरण्यकशिपु को विष्णु से घृणा थी लेकिन प्रह्लाद भगवान का परम भक्त था। प्रह्लाद की प्रेरक यात्रा के बारे में आगे पढ़ें। प्रह्लाद का नाम भगवान विष्णु के सबसे बड़े भक्तों की सूची में आता है।
गजेंद्र अपने पूर्वजन्म में द्रविड़ देश का राजा इन्द्रद्युम्न था। जो की भगवान नारायण का बहुत बड़ा भक्त था। अपनी नारायण भक्ति में वह अपना राजपाट छोड़कर मलय पर्वत में जाकर तपस्वी बन गया और अपना सारा समय भगवान विष्णु की आराधना में लगाया करता था।
इस वर्ष धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:47 बजे से शाम 7:43 बजे तक रहेगा और लगभग 2 घंटे तक रहेगा। देवी लक्ष्मी, गणेश, धन्वंतरि और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है और भगवान को फूल, माला और लापसी या आटे का हलवा, गुड़ के साथ धनिया के बीज या बूंदी के लड्डू का प्रसाद चढ़ाया जा सकता है।