त्रिपुरासुर (त्रिपुर + असुर), तरकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली नामक तीन (असुर) भाई थे। वे तारकासुर के पुत्र थे। वह वज्रांग नामक दैत्य का प्रपौत्र था जो प्रजापति कश्यप और दिति का ज्येष्ठ पुत्र था।
अनुसार एक प्रमुख कथा के अनुसार, भगवान गणेश के प्रेमी और भक्त थे जिन्होंने अपनी माता पार्वती के साथ एक दिन व्रत करने का निर्णय लिया। इस व्रत के दिन गणेश जी ने बिना किसी अंतर्यामी को खाने का भ्रम न किया और उनकी पूजा एवं व्रत ने उन्हें अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने का आशीर्वाद प्रदान किया। इससे यह पर्व सकट चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है और भक्तों को गणेश जी की कृपा का अनुभव करने का अवसर मिलता है। इस प्रकार, सकट चतुर्थी भगवान गणेश के प्रति भक्ति और श्रद्धा का एक उत्कृष्ट रूप है, जो उनकी पूजा और आराधना के माध्यम से भक्तों को सुख, समृद्धि, और आनंद का अहसास कराता है।
शिव गणेश को बहुत आकर्षक मानते थे, उन्होंने उन्हें एक हाथी का सिर और एक उभड़ा हुआ पेट दिया। गणेश का सबसे पहला नाम एकदंत (एक दांत) था, जो उनके एक पूरे दांत का जिक्र था, दूसरा टूटा हुआ था।
भगवान गणेशजी का मस्तक या सिर कटने के पूर्व उनका नाम विनायक था। परंतु जब उनका मस्तक काटा गया और फिर उसे पर हाथी का मस्तक लगाया गया तो सभी उन्हें गजानन कहने लगे। फिर जब उन्हें गणों का प्रमुख बनाया गया तो उन्हें गणपति और गणेश कहने लगे।
संस्कृत शास्त्र आमतौर पर केवल देवसेना को कार्तिकेय की पत्नी मानते हैं, जबकि तमिलनाडु में उनकी दो पत्नियां हैं, देवयानी (देवसेना) और वल्ली।